मै आरक्षण हूँ। : उदय चे
| 28 Feb 2017

वो ही आरक्षण जिसको खत्म करने के लिए आज अगड़ी जातियों ने तांडव मचाया हुआ है। इसलिए आज मै बहुत दुखी हूं। मै तिलमिला रहा हूँ। मै आज जोर-जोर से रो रहा हूँ। लेकिन मेरी रोने की आवाज कोई नही सुन रहा है। मै धीरे-धीरे दम तोड़ रहा हूँ।
मेरी इतनी बुरी मौत होगी, ये मुझे मालूम क्या अहसास भी नही था। कोई मुझे बचाने भी नही आएगा ये भी मैने कभी सोचा नही था। आज मेरे शरीर पर चारो तरफ से हमले है। नुकीलेे तीर से लेकर गोलीयों के छर्रे मुझे छलनी किये जा रहे है।
मै बहुत कमजोर हो गया हूँ। बहुत ही कमजोर............
जो हालात महाभारत में तीरों की सैयां पर लेटे हुए भीष्म के थे। उससे भी बुरे हालात आज मेरे है। मेरी छाव में रहकर कमजोर से कमजोर लोगो ने उन ऊंचाइयों कोछुआजिसकी वो कल्पना भी नही कर सकते थे। लेकिन आज वो मेरे लिए लड़ने की बजाए मुझ पर और मेरे जन्मदाताओं पर बड़े-बड़े इल्जाम लगा रहे है। मुझ पर मेरे अपने ही तीरों की बरसात किये हुए है।
मुझ पर सबसे बड़ा इल्जाम ये है कि मैने जातियो में आपस की खाई को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। जबकी सच्चाई इसके एकदम विपरीत है। मै ही हूँ जिसके कारण दलित, पिछड़े, महिलाओं, कमजोरो को शिक्षा, रोजगार, राजनीती में हिस्सेदारी मिली। उनको आगे बढ़ने का मौका मिला। सामाजिक, राजनितिक, आर्थिक कुछ हद तक समानता मिली। जिनको इंसान का दर्जा भी नही दिया जाता था। उनको मुख्य धारा में लाने का काम बहुत हद तक मैने ही किया है। कमजोर तबको के हजारो सालो से पाँव में पड़ी गुलामी की बेड़िया तोड़ने में मेरा बहुत बड़ा योगदान है।
मुझ पर दूसरा आरोप है किमेरे कारण अयोग्य व्यक्ति आगे बढ़ रहे है। ये आरोप भी सरासर बेबुनियाद है। अयोग्य व्यक्ति तो उस समय बढ़ते थेऔर आज भी बढ़ रहे है जबमुझ पर कुछ खास जात, धर्म या रुपयों वालोका कब्जा होता है। एक सामाजिक, राजनितिक, आर्थिक सम्पन परिवार अपने बच्चे का नाम अच्छे स्कूल में लिखाते है, फिर भी वो बच्चा नही पढ़ता, उसके बाद उच्च शिक्षा में उसका एडमिशन डोनेशन दे कर करवाते हैंऔर फिर डोनेशन से ही नोकरी हासिल कर लेते है।
लेकिन एक बच्चा जिसके माँ-बाप मजदूर है, सामाजिक असमानता झेली है, जातिय उत्पीड़न झेला है, पिछड़ेस्कूल में पढ़ा है, पढ़ाई के साथ-साथ मजदूरी की है, उच्च शिक्षा में दाखिले के लिए कुछ कम नम्बर आये है इसलिए आरक्षण के सहारे एडमिशन ले लेता है। उसके बारे में आर्थिक आरक्षण लिए हुए कहते है कि मेरिट खराब हो गयी, अयोग्य आ गए।
अब मैं मर रहा हूँ। लेकिन आज मर रहा हूँ तो कभी पैदा भी तो हुआ था। इसलिये आज मै मेरे मरने से पहले आपको मेरी जन्म से लेकर अब तक की कही ख़ुशी, कही गम की दास्तां सुनाता हूँ। जब मेरा जन्म हुआ था तो मानव जाति में जो सबसे कमजोर तबका था उसको बहुत ख़ुशी हुई थी। मेरा तो जन्म ही उस कमजोर मानव के लिए हुआ था।
कमजोर, कमजोर मतलब सामाजिक, राजनितिकतौर पर कमजोर और जो सामाजिक, राजनितिक तौर पर कमजोर होता है वो बहुमत में आर्थिक तौर पर भी कमजोर होता है।
जब से मानव समाज की उत्पति हुई है तभी से मेरा जन्म हुआ है। मेरा जन्म का आरम्भ उस माँ ने किया जिसने सबसे पहले अपने कमजोर बच्चे के विकाश में अपने सामान्य बच्चे से थोड़ी ज्यादा मद्दत की, मुझे भी और उस कमजोर बच्चे को भी मेरे जन्म से बहुत ज्यादा ख़ुशी हुई थी।
लेकिन ये ख़ुशी उस समय काफूर हो गयी जब उस माँ की सत्ता का तख्ता पलट करके पुरूषवादी सत्ता ने कब्जा कर लिया। उसके बाद निजी सम्पति ने मुझ पर कब्जा कर लिया।
राज सत्ता ने कब्जा कर लिया। अब राजा का बेटा राजा होगा ये राज सत्ता में आरक्षण था।
पुरोहित का बेटा पुरोहित होगा, ये ब्राह्मणों का आरक्षण था। शिक्षा के दरवाजे सिर्फ कुछ ख़ास वर्ग के लोगो के लिए ही खुलेंगे,पूजा स्थलों पर सिर्फ कुछ लोग ही कब्जाधारी होंगे, व्यापार, जल, जंगल, जमीन ये सब कुछ लोगो के लिए आरक्षित हो गये। मेरे ऊपर इस अमीर लोगो के कब्जे से मै बहुत दुःखी था। मै जोर-जोर से रो रहा था। लेकिन पुरूषवादी सत्ता की विशाल दीवारों से मेरी आवाज टकरा कर धरासाई हो रही थी।
लेकिन मैं पैदा ही कमजोर इंसान के लिये हुआ था। इसलिए मैं भी हार मानने के लिए तैयार नही था मैं बार-बार सत्ता की दीवारों से टकरा रहा था। मै मेरी गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता रहा।
आखिर दीवारों को भी टूटना पड़ा। एक बार फिर मुझे कमजोर इंसानो की सेवा में लगाया गया।
मेरी गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का एक छोटा सा, पर बहुत ही मजबूत प्रयास करने का साहस एक महान योद्धा ने किया।
महाराष्ट्र के कोल्हापुर के महाराजा साहूजी महाराजजो महान शिक्षाविदव् दलितों, पिछड़ो, कमजोरो और महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाने वाले ज्योतिबा फुले और सावँत्री बाई फुलेसे प्रभावित होकर, जिन्होंने अपनी रियासत में पिछड़ो के लिए शिक्षा, रोजगारऔर राजनीती में आरक्षण का प्रावधान किया।
महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारम्भ किया था। कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 की अधिसूचना जारी की गयी थी। यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है।
विंध्य के दक्षिण में प्रेसिडेंसी क्षेत्रो और रियासतों के एक बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गों के लिए आजादी से बहुत पहले आरक्षण की शुरुआत की गयी।

आरक्षण की व्यवस्था
1902 के मध्य में साहू महाराज इंग्लैण्ड गए हुए थे। उन्होंने वहीं से एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये। महाराज के इस आदेश से कोल्हापुर के ब्राह्मणों पर जैसे गाज गिर गयी। उल्लेखनीय है कि सन 1894 में, जब साहू महाराज ने राज्य की बागडोर सम्भाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार लिपिकीय पद के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे। साहू महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के कारण सन 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या अब 35 रह गई थी।
छत्रपति साहू महाराज ने सिर्फ यही नहीं किया, अपितु उन्होंने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों मराठा, महार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ईसाई, मुस्लिम और जैन सभी के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएँ खोलने की पहल की। साहू महाराज ने उनके लिए स्कूल और छात्रावास खोलने के आदेश जारी किये। जातियों के आधार पर स्कूल और छात्रावास असहज लग सकते हैं, किंतु नि:संदेह यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं। उन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये थे। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। साहू महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था। स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी।

छत्रपति साहू महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे। इस पर उन्होंने कहा था कि- "वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते।"
साहू महाराज ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि- "उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये। उनका स्पष्ट कहना था कि- "छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है।"

 1908- अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था, के लिए आरक्षण शुरू किया गया।
 1909 - भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण का प्रावधान किया
 1919 - भारत सरकार अधिनियम 1919 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।
 1921 - मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।
 1935 - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया, जो पूना समझौता कहलाता है, जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए।
 15 अगस्त 1947 को देश में गोरेअंग्रेजो से काले अंग्रेजो के बीच सत्ता हस्ताक्षण होता है। देश का नयासविधान लिखा जाता है। डॉ भीम राव अम्बेडकर के प्रयासों से दलितों को सविधान में आरक्षण की व्यवस्था की जाती है। लेकिन बहुत प्रयासों के बाद भी डॉ साहब पिछड़ो को आरक्षण में शामिल नही कर सके।लेकिन पिछड़ोको आरक्षण 1990 में मण्डल आयोग के निर्देश पर वी पी सिंह ने लागु किया। मण्डल आयोग ने पिछड़ो की परिभाषा साफ-साफ इंकित की- जो जाति सामाजिक आधार पर और शैक्षणिकआधार पर पिछड़ी हुई हो। वो जाति पिछड़ी मानी जायेगी। प्रत्येक जाति की राज्य अनुसार अलग स्थिति हो सकती है।
लेकिन कमजोरो को मिले आरक्षण के खिलाफ अगड़ों ने बहुत बड़े-बड़े हिंसक प्रदर्शन किए। व्यापक पैमाने पर खिलाफ में प्रचार किया।
मैने दलितों-वंचितों में एक मानवीय चेतना का संचार किया है जो उनमें आत्मसम्मान की भावना को बढ़ाता है। मेरे कारण सामाजिक, शैक्षणिक असमानता की दीवार कमजोर हुई है। लेकिन दलितों-पिछड़ों को अगड़ों के बराबर खड़ा करने में मैं अभी भी नाकाम रहाहूँ। उल्टा यह भी सच है कि मेराफायदा उठाकर दलितों में भी एक स्वर्ण तबका पैदा हो गया है।जो आज मुझे गरियाता है।
लेकिन ये अगड़ों को कैसे सहन हो सकता थाकी जिनको उन्होंने इंसान का दर्जा भी नही दिया था वो आज सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर बराबरी करे। उन्होंने हजारो प्रयास कियेमुझे मारने के लिए। लेकिन वो सफल नही हो सके।
अब कुछ समय से अगड़े लोग मुझे मारने के लिए नया फार्मूला लेकर आये है। अब अगड़ी जातियां ही आरक्षण की मांग करने लग गयी है। उनकी एक ही मांग है या तो हमे भी दो या किसी को भी न दो। हरियाणा में जाट और गुजरात में पटेल महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन, उसमें वो कामयाब भी होते जा रहे हैं।
दूसरी तरफ राज्य सरकारें मेरे खात्मे के लिए लगी हुई है। गुजरात के बाद अब हरियाणा सरकार ने भी फैसला लिया है कि जो भी आरक्षित कोटे से फॉर्म एप्लाई करेगा वो जनरल में फाइट नही कर सकता जबकि मेरा तो आधार ही ये था कि
"जो निर्दिष्ट समुदाय के तहत नहीं आते हैं, वे केवल शेष पदों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जबकि निर्दिष्ट समुदाय के सदस्य सभी संबंधित पदों (आरक्षित और सार्वजनिक) के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।"
लेकिन सरकारों द्वारा मेरे आधार को ही खत्म किया जा रहा है।
आरक्षण सामाजिक असमानता दूर करने के लिए था न कि आर्थिक गैरबराबरी दूर करने के लिए। आर्थिक गैरबराबरी दूर करने और जनता की गरीबी, बदहाली दूर करने के लिए हमें उत्पादन के संसाधनों से एक स्वार्थी लुटेरे मानवद्रोही तबके के आरक्षण को तोड़ना होगा तभी सच्चे मायनों में बराबरी आएगी और मानव समाज अपने उत्कर्ष पर पहुँच पायेगा।
आज आरक्षण खत्म करने या आर्थिक आधार पर करने की बहस करने की बजाए बहस इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि आरक्षण अब तक अपने उद्देश्य में कामयाब क्यों नहीं हो पाया। इसके लागू करने में सरकार की विफलता कहाँ रही???

हम मेहनतकश इस दुनियां से जब अपना हिस्सा मांगेंगे।
एक बाग नही, एक खेत नही हम सारी दुनियां मांगेंगे।।
एक बाग नही, एक खेत नही हम सारी दुनियां मांगेंगे।।
हम सारी दुनियां मांगेंगे..............

UDay Che





साहू महाराज ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि- "उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये। उनका स्पष्ट कहना था कि- "छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है।"

 1908- अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था, के लिए आरक्षण शुरू किया गया।
 1909 - भारत सरकार अधिनियम 1909 में आरक्षण का प्रावधान किया
 1919 - भारत सरकार अधिनियम 1919 में आरक्षण का प्रावधान किया गया।
 1921 - मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए आठ प्रतिशत आरक्षण दिया गया था।
 1935 - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया, जो पूना समझौता कहलाता है, जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए।
 15 अगस्त 1947 को देश में गोरेअंग्रेजो से काले अंग्रेजो के बीच सत्ता हस्ताक्षण होता है। देश का नयासविधान लिखा जाता है। डॉ भीम राव अम्बेडकर के प्रयासों से दलितों को सविधान में आरक्षण की व्यवस्था की जाती है। लेकिन बहुत प्रयासों के बाद भी डॉ साहब पिछड़ो को आरक्षण में शामिल नही कर सके।लेकिन पिछड़ोको आरक्षण 1990 में मण्डल आयोग के निर्देश पर वी पी सिंह ने लागु किया। मण्डल आयोग ने पिछड़ो की परिभाषा साफ-साफ इंकित की- जो जाति सामाजिक आधार पर और शैक्षणिकआधार पर पिछड़ी हुई हो। वो जाति पिछड़ी मानी जायेगी। प्रत्येक जाति की राज्य अनुसार अलग स्थिति हो सकती है।
लेकिन कमजोरो को मिले आरक्षण के खिलाफ अगड़ों ने बहुत बड़े-बड़े हिंसक प्रदर्शन किए। व्यापक पैमाने पर खिलाफ में प्रचार किया।
मैने दलितों-वंचितों में एक मानवीय चेतना का संचार किया है जो उनमें आत्मसम्मान की भावना को बढ़ाता है। मेरे कारण सामाजिक, शैक्षणिक असमानता की दीवार कमजोर हुई है। लेकिन दलितों-पिछड़ों को अगड़ों के बराबर खड़ा करने में मैं अभी भी नाकाम रहाहूँ। उल्टा यह भी सच है कि मेराफायदा उठाकर दलितों में भी एक स्वर्ण तबका पैदा हो गया है।जो आज मुझे गरियाता है।
लेकिन ये अगड़ों को कैसे सहन हो सकता थाकी जिनको उन्होंने इंसान का दर्जा भी नही दिया था वो आज सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर बराबरी करे। उन्होंने हजारो प्रयास कियेमुझे मारने के लिए। लेकिन वो सफल नही हो सके।
अब कुछ समय से अगड़े लोग मुझे मारने के लिए नया फार्मूला लेकर आये है। अब अगड़ी जातियां ही आरक्षण की मांग करने लग गयी है। उनकी एक ही मांग है या तो हमे भी दो या किसी को भी न दो। हरियाणा में जाट और गुजरात में पटेल महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन, उसमें वो कामयाब भी होते जा रहे हैं।
दूसरी तरफ राज्य सरकारें मेरे खात्मे के लिए लगी हुई है। गुजरात के बाद अब हरियाणा सरकार ने भी फैसला लिया है कि जो भी आरक्षित कोटे से फॉर्म एप्लाई करेगा वो जनरल में फाइट नही कर सकता जबकि मेरा तो आधार ही ये था कि
"जो निर्दिष्ट समुदाय के तहत नहीं आते हैं, वे केवल शेष पदों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जबकि निर्दिष्ट समुदाय के सदस्य सभी संबंधित पदों (आरक्षित और सार्वजनिक) के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।"
लेकिन सरकारों द्वारा मेरे आधार को ही खत्म किया जा रहा है।
आरक्षण सामाजिक असमानता दूर करने के लिए था न कि आर्थिक गैरबराबरी दूर करने के लिए। आर्थिक गैरबराबरी दूर करने और जनता की गरीबी, बदहाली दूर करने के लिए हमें उत्पादन के संसाधनों से एक स्वार्थी लुटेरे मानवद्रोही तबके के आरक्षण को तोड़ना होगा तभी सच्चे मायनों में बराबरी आएगी और मानव समाज अपने उत्कर्ष पर पहुँच पायेगा।
आज आरक्षण खत्म करने या आर्थिक आधार पर करने की बहस करने की बजाए बहस इस बात पर केंद्रित होनी चाहिए कि आरक्षण अब तक अपने उद्देश्य में कामयाब क्यों नहीं हो पाया। इसके लागू करने में सरकार की विफलता कहाँ रही???

हम मेहनतकश इस दुनियां से जब अपना हिस्सा मांगेंगे।
एक बाग नही, एक खेत नही हम सारी दुनियां मांगेंगे।।
एक बाग नही, एक खेत नही हम सारी दुनियां मांगेंगे।।
हम सारी दुनियां मांगेंगे..............

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