ब्राह्मणों के प्रकार का इतिहास बताता है ये है घुमन्तु प्रजाति के और भारत में है आक्रमणकारी
| 24 Mar 2017

भारत में यह रहस्य अब बिलकुल नहीं रहा जब ब्राह्मण पहले कहते हे की ये देवता है और भगवान् ने इन्हें बनाया है और भारत में ही सारे भगवान् पैदा हुए , वैज्ञानिक शोध से सब मालूम हो चुका है की ये लोग इस देश में विदेशो से आये घुमन्तु जाति के के लोग है और जहा जहा इनको स्थान मिलता गया ये वहा अपना वर्चस्व कायम करते गए इनके खुद के ग्रंथो से ही मालूम होता है की ये विदेशी हमलावर है
यहाँ पर कुछ ब्राह्मणों के प्रकार दिए गए है

शाकद्वीपीय ब्राह्मण/ मग ब्रह्मिनो का इतिहास खोजना शुरू किया तो भारत से लेकर अर्याण (ईरान) और ग्रीक से शुरू होता हे, पारसी धर्म और इसाई धर्म के अन्दर उल्लेख निकलते हे,अर्याण (ईरान) के सबसे पुराने मध् साम्राज्य तक में मग ब्रह्मिनो का इतिहास दर्ज हे.

पुष्करना ब्रह्मिनो का इतिहास भारत से शुरू होकर पारस (पर्शिया) तक जाता हे, कितनी सभ्यताओ से निकलके पुजारी रहते हुए युद्द का इतिहास आ जाता हे, अर्याण (ईरान) के इतिहास में जाके मिल जाता हे.
दाधीच ब्रह्मिनो का इतिहास अरब से शुरू होकर शाकद्वीप के भारत तक चला आता है
दाधीच ब्रह्मिनो का एक कुल करेशिया का उल्लेख इस्लाम के सबसे पुराने खानदान कुरेशिया जिसे पैगम्बर हुए उनसे मिलता हे.

सारस्वत ब्रह्मिनो का इतिहास सरस्वती नदी मध्य एशिया से लेकर अरब तक आ जाता हे, मरुधरा (राजस्थान) में रहते सारस्वतो का उल्लेख इस्लाम के कर्बला में जाता हे, कभी श्रेष्ठ पंडित बनके स्तोत्र रचना करदी तो कभी तलवारे उठाकर शिया मुस्लिमो के साथ मिलके याज़िद को ख़तम किया,

श्रीमाली ब्रह्मिनो का इतिहास अरब के रेगिस्तान से शुरू होता हे जो सीधा श्री लंका तक चला जाता हे, कभी पंडित बनके श्रीमाल पुराण की रचना करते ब्राह्मण गुजरात के सोलंकी घराने से युद्द में उतर जाते हे.
मालवीय ब्रह्मिनो का इतिहास मलय पर्वत से शुरू होता हे , सर्युपरीन ब्रह्मिनो का इतिहास सुवर्ण द्वीप (सुमात्रा) से मिलता हे भुमिहर ब्रह्मिनो का इतिहास रुमेर (कम्बोडिया) से मध्य मगध तक जा मिलता हे.

जिस तरह मात्र एक शाकद्वीपीय ब्राह्मण का इतिहास खोजने के लिए पहले देखना पड़ा उत्पति स्थल ईरान हे, उसके बाद उसके इतिहासकार ने बताया शाकद्वीपीय ब्राह्मण ईरान के भी सबसे पुराने मेदेस साम्राज्य के पुजारी हे, अब मेदेस साम्राज्य के इतिहास में घुसे तो पता चलता हे वे पारसी धर्म के भी पुजारी रहे, पारशी धर्म का इतिहास आगे यहूदी धर्म के मागी और मागुस ब्राह्मण जुड़ते गए, यहूदी धर्म के शामन ज्योतिष का इतिहास खोजे तो पता चला वो भी माघ ब्राह्मण निकलते हे जिन्होंने इसा मसीह के जन्म पर उनके इश्वर होने की पुष्टि की, उसके बाद कुरान में आयात निकलती हे.

उसके बाद ब्रह्मणों द्वारा लिखे ग्रन्थ के पुराण देखे तो शाकद्वीपीय ब्रह्मिनो के जम्बूद्वीप आने की कहानी लिखी होती हे, जिसका उल्लख खुद महाभारत में भी आता हे.


१०३ ई पू में ब्राह्मणों द्वारा लिखे ग्रंथो में ही ब्राह्मणों की उत्पत्ति कुछ इस तरह मिलती है
"श्री" एक एव पुर वेद: प्रणव: सर्ववाङमय देवो नारायणो ,नान्योरहयेकोsग्निवर्ण एव च।
न विशेषोsस्ति वर्णानां सर्व ब्रह्ममयं जगत। प्रथम: ब्राह्मण: कर्मणा वर्णतां गत:।।

पहले वेद एक था। ओंकार में संपूर्ण वांगमय समाहित था। एक देव नारायण था। एक अग्नि और एक वर्ण था। वर्णों में कोई वैशिष्ट्यर नहीं था सब कुछ ब्रह्मामय था। सर्वप्रथम ब्राह्मण बनाया गया और फिर कर्मानुसार दूसरे वर्ण बनते गए. सभी व्यूक्ति विराट पुरुष की संतान हैं और सभी थोड़ा बहुत ज्ञान भी रखते हैं तो भी वो अपने आप को ब्राह्मण नहीं कहते। एक निरक्षर भट्टाचार्य मात्र ब्राह्मण के घर जन्म लेने से अपने आपको ब्राह्मण कहता है। और न केवल वही कहता है अपितु भिन्नन-भिन्नर समाजों के व्यहक्ति भी उसे पण्डितजी कहकर पुकारते हैं। लोकाचार सब न्या यों में व सब प्रमाणों में बलवान माना जाता है "सर्व ब्रह्मामयं जगत" अनुसार सब कुछ ब्रह्म है और ब्रह्म की संतान सभी ब्राह्मण हैं। डॉ. रामेश्वार दत्त शर्मा द्वारा लिखित पुस्तटक 'ब्राह्मण समाज परिचय एवं योगदान' के मुखपृष्ठ पर अंकित ब्रह्मरूपी वृक्ष में 14 शाखाएं हैं और इन चौदह शाखाओं में अलग-अलग ब्राह्मणों का वर्णन किया गया है।

जैसे 1. गौड़ आदि गौड़, बंगाली और त्यामगी 2. सारस्वपत, कुमडिये, जैतली, झिगन, त्रिखे, मोहल्ले , कश्मीडरी 3. खण्डेंलवाल, दायमा, पुष्कारणा, श्रीमाली, पारीक, पालीवाल, चोरसिया 4. कान्य्कुब्जट, भुमिहार, सरयूपारीण, सनाढय, जिझौतिया 5. मैथल, श्रोत्रिय 6. उत्क ल, मस्ताकना 7. सुवर्णकार, पांचाल, शिल्पेयान, जांगडा, धीमान 8. गोस्वाामी, आचार्य, डाकोत, वेरागी, जोगी, ब्रह्मभाट 9. कौचद्वीपी, शाकद्वीपी 10. कर्णाटक 11. तैलंग, बेल्लाेरी, बगिनाड, मुर्किनाड़ 12. द्राविड़, नम्बू दरी 13. महाराष्ट‍ चितपावन 14. गुर्जर, औदित्य्, गुर्जर गौड़ नागर तथा देशाई। इस प्रकार ब्राह्मणों के कुछ 54 भेद हुए। जब ब्राह्मण एक जाति बन गई तो उनकी पहचान के लिए उनके वेद, शाखा, सूत्र गोत्र, प्रवर आदि पहचान कारक माने गए। यह क्रम मध्य काल तक चलता रहा। तदन्त र ब्राह्मणों के भेद उनके प्रदेशों के आधार पर गठित किए गए।
पं. छोटेलाल शर्मा ने अपने ब्राह्मण निर्णय में ब्राह्मणों के 324 भेद लिखे हैं। ब्लूतम फील्‍ड के अनुसार ब्राह्मणों के 2500 भेद हैं। शेरिंग सा‍हब के अनुसार ब्राह्मणों के 1782 भेद हैं, कुक साहब के अनुसार ब्राह्मणों के 924 भेद हैं, जाति भास्क र आदि ग्रन्‍‍थों के अनुसार ब्राह्मणों के 51 भेद हैं। वैदिक काल में और उसके बहुत समय बाद तक किसी ना के साथ उपाधि लगती दिखाई नहीं देती। केवल नामों का ही उल्ले ख मिलता है। जैसे कश्यकप, नारद, वशिष्ठी, पराशर, शांडिल्यर, गौतम आदि, बाद में मनु के चारों वर्णों के चार आस्पादों का उल्ले ख मिलता है। अर्थात ब्राह्मण शर्मा, क्षत्रिय वर्मा, वैश्यण गुप्त तथा शुद्र दास आदि शब्दों का प्रयोग अपने नाम के पीछे करने लगे। बहुत समय बाद गुण, कर्म और वृति के सूचक तथा प्रशासकों, राजा-महाराजाओं द्वारा प्रदत्त उपाधियों का प्रयोग होने लगा। अधिकांश उपाधियां मुस्लिमकाल में प्रचलित हुईं। स्मृाति और पुराणों के युग के बाद ब्राह्मणों की भट्ट और मिश्रा उपाधियां अधिक मिलीं। महाराजा गोविन्द् चन्द्रादेव आदि गहखार राजाओं के समय ठाकुर और राउत पदवी भी ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्तल होने के प्रमाण मिलते हैं। मिश्रा, पाण्डेंय, शुक्ल , द्विवेदी, चतुर्वेदी आदि उपाधियां शासन द्वारा प्रदत्त हैं। उसी समय की रायसिंह आदि उपाधियां शासन द्वारा प्रदत्त हैं।
जो पाण्डे।य, द्विवेदी आदि उपाधिधारी थे वे बाद में शासन द्वारा राय, सिंह, चौधरी आदि हो गए। मुस्लिम शासन के समय मियां, खान आदि उपाधियां ब्राह्मणों को दी गई। तानसेन मिश्र को मियां की उपाधि दी गई थी। वेद पढ़ने पढ़ाने से द्विवेदी (दूबे) हो गए। त्रिवेदी (तिवाड़ी), चतुर्वेदी (चौबे), अध्याीपक होने से (पाठक) उपाध्या य (ओझा), यज्ञादि कर्मानुष्ठाईन कराने से वाजपेयी, अग्निहोत्री, अवस्थीु, दीक्षित और समृति कर्मानुष्ठा(न कराने से मिश्र, शुक्ल् वंश के पुरुष के नाम से शांडिल्यर (सान्याील) पदवी के नाम से चक्रवर्ती, मुखर्जी, चटर्जी, बनर्जी, गांगुली, भट्टाचार्य कार्य व गुण के कारण से दीक्षित सनाढ्य याजक नैगम, आचार्य वेद की पद, क्रम, जटा, माला, रेखाध्वीज, दंडरथ और धनपाठ आदि आठ पद्धतियों में से तीन प्रकार के पाठ करने वाले त्रिपाठी कहलाए।

उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणो के भेद इस प्रकार है-

81 ब्राम्हाणो की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या (1) गौड़ ब्राम्हण (2)मालवी गौड़ ब्राम्हण (3) श्री गौड़ ब्राम्हण (4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण (5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण (6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण (7) शोरथ गौड ब्राम्हण (8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण (9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण (10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण (11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण (षोभर) (12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण (13) वाल्मीकि ब्राम्हण (14) रायकवाल ब्राम्हण (15) गोमित्र ब्राम्हण (16) दायमा ब्राम्हण (17) सारस्वत ब्राम्हण (18) मैथल ब्राम्हण (19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण (20) उत्कल ब्राम्हण (21) सरवरिया ब्राम्हण (22) पराशर ब्राम्हण (23) सनोडिया या सनाड्य (24)मित्र गौड़ ब्राम्हण (25) कपिल ब्राम्हण (26) तलाजिये ब्राम्हण (27) खेटुुवे ब्राम्हण (28) नारदी ब्राम्हण (29) चन्द्रसर ब्राम्हण (30)वलादरे ब्राम्हण (31) गयावाल ब्राम्हण (32) ओडये ब्राम्हण (33) आभीर ब्राम्हण (34) पल्लीवास ब्राम्हण (35) लेटवास ब्राम्हण (36) सोमपुरा ब्राम्हण (37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण (38) नदोर्या ब्राम्हण (39) भारती ब्राम्हण (40) पुश्करर्णी ब्राम्हण (41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण (42) भार्गव ब्राम्हण (43) नार्मदीय ब्राम्हण (44) नन्दवाण ब्राम्हण (45) मैत्रयणी ब्राम्हण (46) अभिल्ल ब्राम्हण (47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण (48) टोलक ब्राम्हण (49) श्रीमाली ब्राम्हण (50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण (51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण (52) तांगड़ ब्राम्हण (53) सिंध ब्राम्हण (54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण (55) इग्यर्शण ब्राम्हण (56) धनोजा म्होड ब्राम्हण (57) गौभुज ब्राम्हण (58) अट्टालजर ब्राम्हण (59) मधुकर ब्राम्हण (60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण (61) खड़ायते ब्राम्हण (62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण (63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण (64) लाढवनिये ब्राम्हण (65) झारोला ब्राम्हण (66) अंतरदेवी ब्राम्हण (67) गालव ब्राम्हण (68) गिरनारे ब्राम्हण (69) गुग्गुले ब्राम्हण (70) मेरठवाल ब्राम्हण (71) जाम्बु ब्राम्हण (72) वाइड़ा ब्राम्हण (73) कड़ोल ब्राम्हण (74) ओदुवे या दुवे (75) वटमूल ब्राम्हण (76) श्रृंगालभाट ब्राम्हण (77) गौतम ब्राम्हण (78) पाल ब्राम्हण (79) सोताले ब्राम्हण (80) सिरापतन मोताल ब्राम्हण (81) महाराणा ब्राम्हण (82) चितपाक ब्राम्हण (83) कराश्ट ब्राम्हण (84) त्रिहोत्री या अग्निहोत्री ब्राम्हण (85) दशगोत्री ब्राम्हण (86) द्वात्रिदश ब्राम्हण (87) पन्तिय ग्राम ब्राम्हण (88) मिथिनहार ब्राम्हण (89) सौराष्ट्र।




न विशेषोsस्ति वर्णानां सर्व ब्रह्ममयं जगत। प्रथम: ब्राह्मण: कर्मणा वर्णतां गत:।।

पहले वेद एक था। ओंकार में संपूर्ण वांगमय समाहित था। एक देव नारायण था। एक अग्नि और एक वर्ण था। वर्णों में कोई वैशिष्ट्यर नहीं था सब कुछ ब्रह्मामय था। सर्वप्रथम ब्राह्मण बनाया गया और फिर कर्मानुसार दूसरे वर्ण बनते गए. सभी व्यूक्ति विराट पुरुष की संतान हैं और सभी थोड़ा बहुत ज्ञान भी रखते हैं तो भी वो अपने आप को ब्राह्मण नहीं कहते। एक निरक्षर भट्टाचार्य मात्र ब्राह्मण के घर जन्म लेने से अपने आपको ब्राह्मण कहता है। और न केवल वही कहता है अपितु भिन्नन-भिन्नर समाजों के व्यहक्ति भी उसे पण्डितजी कहकर पुकारते हैं। लोकाचार सब न्या यों में व सब प्रमाणों में बलवान माना जाता है "सर्व ब्रह्मामयं जगत" अनुसार सब कुछ ब्रह्म है और ब्रह्म की संतान सभी ब्राह्मण हैं। डॉ. रामेश्वार दत्त शर्मा द्वारा लिखित पुस्तटक 'ब्राह्मण समाज परिचय एवं योगदान' के मुखपृष्ठ पर अंकित ब्रह्मरूपी वृक्ष में 14 शाखाएं हैं और इन चौदह शाखाओं में अलग-अलग ब्राह्मणों का वर्णन किया गया है।

जैसे 1. गौड़ आदि गौड़, बंगाली और त्यामगी 2. सारस्वपत, कुमडिये, जैतली, झिगन, त्रिखे, मोहल्ले , कश्मीडरी 3. खण्डेंलवाल, दायमा, पुष्कारणा, श्रीमाली, पारीक, पालीवाल, चोरसिया 4. कान्य्कुब्जट, भुमिहार, सरयूपारीण, सनाढय, जिझौतिया 5. मैथल, श्रोत्रिय 6. उत्क ल, मस्ताकना 7. सुवर्णकार, पांचाल, शिल्पेयान, जांगडा, धीमान 8. गोस्वाामी, आचार्य, डाकोत, वेरागी, जोगी, ब्रह्मभाट 9. कौचद्वीपी, शाकद्वीपी 10. कर्णाटक 11. तैलंग, बेल्लाेरी, बगिनाड, मुर्किनाड़ 12. द्राविड़, नम्बू दरी 13. महाराष्ट‍ चितपावन 14. गुर्जर, औदित्य्, गुर्जर गौड़ नागर तथा देशाई। इस प्रकार ब्राह्मणों के कुछ 54 भेद हुए। जब ब्राह्मण एक जाति बन गई तो उनकी पहचान के लिए उनके वेद, शाखा, सूत्र गोत्र, प्रवर आदि पहचान कारक माने गए। यह क्रम मध्य काल तक चलता रहा। तदन्त र ब्राह्मणों के भेद उनके प्रदेशों के आधार पर गठित किए गए।
पं. छोटेलाल शर्मा ने अपने ब्राह्मण निर्णय में ब्राह्मणों के 324 भेद लिखे हैं। ब्लूतम फील्‍ड के अनुसार ब्राह्मणों के 2500 भेद हैं। शेरिंग सा‍हब के अनुसार ब्राह्मणों के 1782 भेद हैं, कुक साहब के अनुसार ब्राह्मणों के 924 भेद हैं, जाति भास्क र आदि ग्रन्‍‍थों के अनुसार ब्राह्मणों के 51 भेद हैं। वैदिक काल में और उसके बहुत समय बाद तक किसी ना के साथ उपाधि लगती दिखाई नहीं देती। केवल नामों का ही उल्ले ख मिलता है। जैसे कश्यकप, नारद, वशिष्ठी, पराशर, शांडिल्यर, गौतम आदि, बाद में मनु के चारों वर्णों के चार आस्पादों का उल्ले ख मिलता है। अर्थात ब्राह्मण शर्मा, क्षत्रिय वर्मा, वैश्यण गुप्त तथा शुद्र दास आदि शब्दों का प्रयोग अपने नाम के पीछे करने लगे। बहुत समय बाद गुण, कर्म और वृति के सूचक तथा प्रशासकों, राजा-महाराजाओं द्वारा प्रदत्त उपाधियों का प्रयोग होने लगा। अधिकांश उपाधियां मुस्लिमकाल में प्रचलित हुईं। स्मृाति और पुराणों के युग के बाद ब्राह्मणों की भट्ट और मिश्रा उपाधियां अधिक मिलीं। महाराजा गोविन्द् चन्द्रादेव आदि गहखार राजाओं के समय ठाकुर और राउत पदवी भी ब्राह्मणों के लिए प्रयुक्तल होने के प्रमाण मिलते हैं। मिश्रा, पाण्डेंय, शुक्ल , द्विवेदी, चतुर्वेदी आदि उपाधियां शासन द्वारा प्रदत्त हैं। उसी समय की रायसिंह आदि उपाधियां शासन द्वारा प्रदत्त हैं।
जो पाण्डे।य, द्विवेदी आदि उपाधिधारी थे वे बाद में शासन द्वारा राय, सिंह, चौधरी आदि हो गए। मुस्लिम शासन के समय मियां, खान आदि उपाधियां ब्राह्मणों को दी गई। तानसेन मिश्र को मियां की उपाधि दी गई थी। वेद पढ़ने पढ़ाने से द्विवेदी (दूबे) हो गए। त्रिवेदी (तिवाड़ी), चतुर्वेदी (चौबे), अध्याीपक होने से (पाठक) उपाध्या य (ओझा), यज्ञादि कर्मानुष्ठाईन कराने से वाजपेयी, अग्निहोत्री, अवस्थीु, दीक्षित और समृति कर्मानुष्ठा(न कराने से मिश्र, शुक्ल् वंश के पुरुष के नाम से शांडिल्यर (सान्याील) पदवी के नाम से चक्रवर्ती, मुखर्जी, चटर्जी, बनर्जी, गांगुली, भट्टाचार्य कार्य व गुण के कारण से दीक्षित सनाढ्य याजक नैगम, आचार्य वेद की पद, क्रम, जटा, माला, रेखाध्वीज, दंडरथ और धनपाठ आदि आठ पद्धतियों में से तीन प्रकार के पाठ करने वाले त्रिपाठी कहलाए।

उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणो के भेद इस प्रकार है-

81 ब्राम्हाणो की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या (1) गौड़ ब्राम्हण (2)मालवी गौड़ ब्राम्हण (3) श्री गौड़ ब्राम्हण (4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण (5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण (6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण (7) शोरथ गौड ब्राम्हण (8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण (9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण (10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण (11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण (षोभर) (12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण (13) वाल्मीकि ब्राम्हण (14) रायकवाल ब्राम्हण (15) गोमित्र ब्राम्हण (16) दायमा ब्राम्हण (17) सारस्वत ब्राम्हण (18) मैथल ब्राम्हण (19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण (20) उत्कल ब्राम्हण (21) सरवरिया ब्राम्हण (22) पराशर ब्राम्हण (23) सनोडिया या सनाड्य (24)मित्र गौड़ ब्राम्हण (25) कपिल ब्राम्हण (26) तलाजिये ब्राम्हण (27) खेटुुवे ब्राम्हण (28) नारदी ब्राम्हण (29) चन्द्रसर ब्राम्हण (30)वलादरे ब्राम्हण (31) गयावाल ब्राम्हण (32) ओडये ब्राम्हण (33) आभीर ब्राम्हण (34) पल्लीवास ब्राम्हण (35) लेटवास ब्राम्हण (36) सोमपुरा ब्राम्हण (37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण (38) नदोर्या ब्राम्हण (39) भारती ब्राम्हण (40) पुश्करर्णी ब्राम्हण (41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण (42) भार्गव ब्राम्हण (43) नार्मदीय ब्राम्हण (44) नन्दवाण ब्राम्हण (45) मैत्रयणी ब्राम्हण (46) अभिल्ल ब्राम्हण (47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण (48) टोलक ब्राम्हण (49) श्रीमाली ब्राम्हण (50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण (51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण (52) तांगड़ ब्राम्हण (53) सिंध ब्राम्हण (54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण (55) इग्यर्शण ब्राम्हण (56) धनोजा म्होड ब्राम्हण (57) गौभुज ब्राम्हण (58) अट्टालजर ब्राम्हण (59) मधुकर ब्राम्हण (60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण (61) खड़ायते ब्राम्हण (62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण (63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण (64) लाढवनिये ब्राम्हण (65) झारोला ब्राम्हण (66) अंतरदेवी ब्राम्हण (67) गालव ब्राम्हण (68) गिरनारे ब्राम्हण (69) गुग्गुले ब्राम्हण (70) मेरठवाल ब्राम्हण (71) जाम्बु ब्राम्हण (72) वाइड़ा ब्राम्हण (73) कड़ोल ब्राम्हण (74) ओदुवे या दुवे (75) वटमूल ब्राम्हण (76) श्रृंगालभाट ब्राम्हण (77) गौतम ब्राम्हण (78) पाल ब्राम्हण (79) सोताले ब्राम्हण (80) सिरापतन मोताल ब्राम्हण (81) महाराणा ब्राम्हण (82) चितपाक ब्राम्हण (83) कराश्ट ब्राम्हण (84) त्रिहोत्री या अग्निहोत्री ब्राम्हण (85) दशगोत्री ब्राम्हण (86) द्वात्रिदश ब्राम्हण (87) पन्तिय ग्राम ब्राम्हण (88) मिथिनहार ब्राम्हण (89) सौराष्ट्र।

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