वीर्य का मनोविज्ञान : जो यह लेख पढ़ेगा उसे कभी नहीं होगी सेक्स समस्या
| 06 Apr 2017

जन उदय : अगर सेक्स जीवन की मूल जरूरत है तो वीर्य उसका आधार है यानी जिसके पास जितना वीर्य यानी सेक्स क्षमता है और इस सेक्स क्षमता का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पढता है उसके वयवहार पर क्या असर पढता है इसके वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक अध्यन पुरे विश्व में किये गए है लेकिन सबसे बड़े कमालकी बात यह है की इन मनोवैज्ञानिक अध्यानो को केवल वही सेक्सोलोजिस्ट ही अध्यन करते है और इस्तेमाल करते है जो सेक्सोलोजिस्ट का कार्य करते है यानी सेक्स सम्बन्धी दवाईया बेचते है और सच यह है की आधी से जयादा दवाई सिर्फ मनोवैज्ञानिक विकार को दूर करते है यानी सेक्स संबंद्धि भ्रान्तिया दूर करते है

जानिये वीर्य की क्षमता से क्या क्या प्रभाव हमारे जीवन पर पढ़ते है , युवा अवस्था में सही जानकारी न होने के कारण हस्थ्मैथुन करने से शादी से पहले या शादीशुदा जीवन में हमेशा मर्द को यह कुंठा रहती है की उसमे कमी है जिसके कारण तनाव ,अवसाद व्यक्ति में रहता है अपने आपको सेक्सुअली स्ट्रोंग दिखाने के लिए व्यक्ति बाजार से कुछ दवाई लेता है और जो लोग यह स्वीकार नहीं करते की वो कमजोर है वो लोग सेक्स के वक्त स्त्री के बदन को नोच कर काट कर या हिंसक हो कर स्त्री का पराजित करना चाहते है ताकि वो अपना वर्चस्व दिखा सके , सिगमंड फ्रायड ने इसे एक तरह का मेल ईगो डिफेंस मकेनिस्म बताया है

दुसरे मनोवैज्ञानिक कोलमन & कोलमन ने अपनी पुस्तक एब्नार्मल साइकोलॉजी में बताया है की मर्दानगी एक ऐसी चीज है जिसका मर्द को जब तक अहसास रहता है वह सामाजिक रूप से काफी सक्षम रहता है यही कारण है कई बार ऐसे केस सामने आते है जब बुजुर्ग लोग कमसिन लडकियो की तरफ ज्यादा ध्यान देते है या सेक्स करना चाहते है , इस्ससे उनके मन में यह विशवास रहता है की वो अभी मर्द है

युवाओं में कई बार सेक्स न करने की कुंठा यानी वीर्य की कमी से इतनी बढ़ जाति है की वो लडकियो के मामले में हिंसक हो जाते है और अगर लड़की खुद भी सेक्स के लिए प्रोपोसे करे तो भी वो उसको हिंसक रूप से ही मिलते है . डेविड गयेर ने इस बात का उधाहर्ण भारतीय ग्रन्थ से लिया है की जब सुपुर्नका ने लाक्स्मन को सेक्स के लिए आमंत्रित किया तो लाक्स्मन ने अपना आत्मसम्मान बचाने के लिए सुपुर्न्खा की नाक काट दी और अपनी नुपुन्स्कता को छिपा लिया ..यह बात शायद भारतीय को बुरा लगे ,

लेकिन भारत ही नहीं दुनिया के संधर्भ में वाटसन ने कहा है की जब तक इंसान में वीर्य की क्षमता रहती है तो वह सांसारिक ही रहना चाहता है और जैसे जैसे बुढापा यानी वीर्य कम होने लगता है आदमी नैतिक का भी दामन थाम लेता है , यानी किसी की बहन बेटी को ऐसे मत देखो , लड़के लडकिया साथ मत रहो आदि आदि यह बात अक्सर भारत में लोग साधू संत , समाज सुधारक बन जाते है और कई बूढ़े लोग जिन्हें हम ठरकी भी कहते है अक्सर सेक्स की चाह रखते है हलांकि यह वीर्य की क्षमता योवन की क्षमता की तरह नहीं होती .
वीर्य क्षमता और सेक्स की इच्छा केवल मनोवैज्ञानिक है और व्यक्ति के स्वास्थ पर निर्भर होती है