मुर्दाखोर! मो. मिनाज़
| 19 Feb 2019

मुर्दाखोर पशुओं की एक प्रवृत्ति होती है जंगल में कोई बड़ा जानवर मसलन हाथी, भैसा, घोड़ा मर जाये तो वे दावत की लालसा में सामूहिक खुशी जाहिर करते हैं।

कभी किसी विशाल पशु की लाश को भँभोड़ते गिद्धों, कुत्तों, कौओं, लकड़भग्गों के झुंड को गौर से देखिये। उनकी चीत्कार की आवाज़ का टोन सुनिए।

अगर वह विशाल पशु अभी पूर्णतः मरा नहीं है तो ये उस घायल अथवा बीमार पशु का कई दिन तक पीछा करेंगे, उसपर नज़र रखेंगे, कुछ तो उसके पूर्णता मारने से पहले ही अपनी दावत शुरू कर देंगे।

आप आज भारत भर की सड़कों पर नेताओं और समर्थकों के ऐसे मुर्दाखोर इंसानों के झुंड देख सकते हैं। जो दिवंगत सैनिकों/ जवानों की लाशों से अपना हिस्सा वसूल कर पाने के उन्माद में वैसी ही चीत्कार पूर्ण आवाज़ें निकाल रहे हैं। शोक के रुदन प्रदर्शन, शांतिपूर्ण गरिमा प्रदर्शन, गंभीरता से दिवंगत शरीर को विदा कर उसका शोक मनाने की जगह वे भव्यता पूर्ण विशाल राष्ट्रीय दावत का आयोजन कर उस शरीर से अपने लाभ सुनिश्चित करने के लिए चीख चिल्ला रहे हैं।

इन मुर्दाखोरों की खुशी, शारीरिक भाषा, स्वरों के उत्तर चढ़ाव, झुंडों की संख्या, इनके व्यवहार का एक तुलनात्मक अध्ययन अगर जंगल में नहीं जा सकते तो अपने शहर, गांव, कस्बे से गुजरते हाईवे पर दुर्भाग्य से ट्रक से टकरा कर मर गई किसी एक गाय के शरीर को खोज निकालिए।

दो घंटे दूर से बैठकर उस शव पर मंडराते गिद्धों, कौओं, कुत्तों के व्यवहार, शारीरिक भाषा स्वर के उतार चढ़ाव का प्रेक्षण कीजिये। चाहे तो शूट कर लीजिए।

अब घर पर बैठकर इस वीडियो का शहीदों की लाशों पर क्रेडिट लेने टूट पड़े गर्व से राजनैतिक नारे लगाते भक्तों के किसी भी वीडियो से करिये।

आप खुद मेरी बात का आशय समझ जायेंगे।