महात्मा गांधी को किसने मारा : Uday che < who killed Gandhi
| 04 Jul 2019


सवाल आसान लगता है लेकिन गम्भीरता से सोचा जाए तो पेचीदा भी है।
साधारण तौर पर देखा जाये तो महात्मा गांधी जी की मौत का सीधा जिम्मेदार नाथूराम गोड़से था। जिसने गांधी जी को 3 गोलिया मारी और उनकी हत्या कर दी। नाथूराम गोड़से जो उग्र हिन्दुतत्व की राजनीति का ध्वज उठाये हुए था। जिसकी पीठ पीछे हिन्दुतत्व की राजनीति करने वाला खेमा खड़ा था। गांधी जी की हत्या स्वतन्त्र भारत की पहली आंतकवादी कार्यवाही थी जिसको हिंदुत्ववादी खेमे ने अंजाम दिया था। गांधी की हत्या के बाद हिंदुत्ववादी संघठनो ने गांधी की हत्या पर खुशी मनाते हुए पूरे देश मे लड्डू बांटे। आज 70 साल बाद भी ये धार्मिक आंतकवादी प्रत्येक हत्या के बाद ऐसे ही खुशी मनाते हैं।
गांधी की हत्या 1948 में हो गयी उसके बाद उसके कातिलों को फांसी भी हो गयी। लड्डू बांटने वाले संघठनो पर उस समय की सरकार में गृहमंत्री रहे सरदार पटेल ने बैन भी लगा दिया।
लेकिन क्या गांधी को मारने से गांधी मर गए।

Medgar Evers ने कहा है कि -
"आप इंसान को तो मार सकते हो,
लेकिन उसके विचार को नही मार सकते हो"

हत्यारी सोच ये जानती थी इसलिए उन्होंने सबसे पहले गांधी को मारा, गांधी की सोच को मारने के लिए वो पिछले 70 सालों से लगे हुए है। बहुत हद तक वो कामयाब भी हुए है। ऐसी हत्यारी सोच कामयाब कैसे हुई ये सोचना आज जरूरी है।
सबसे पहले तो उस समय की महान सख्सियत थी उनको जान ले।
1. जवाहर लाल नेहरू
2. डॉ अम्बेडकर
3. सरदार पटेल

ये तीनों जो उस समय कॉग्रेस के पदाधिकारी व भारत सरकार और भारत की बहुमत जनता का नेतृत्व कर रहे थे। ये सब गांधी जी के अनुयायी थे। उनको पूजनीय मानते थे। इन सबकी बहुत से मुद्दों पर गांधी जी से असहमतियां थी लेकिन फिर भी ये महात्मा जी के साथ खड़े थे।
आवाम का एक बड़ा तबका जिसका नेतृत्व क्रांतिकारी विचारधारा का नेतृत्व करने वाले भगतसिंह और उसके साथी कर रहे थे।
जब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन के साथियों ने अपनी पार्टी लाईन के अनुसार 23 दिसंबर, 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वाइसराय की गाड़ी को उड़ाने का प्रयास किया, जो असफल रहा। गाँधी जी ने इस घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख "बम की पूजा" लिखा, जिसमें उन्होनें वाइसराय को देश का शुभचिंतक और नवयुवकों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले कहा। महात्मा जी के इस लेख के जवाब में भगवती सिंह वोहरा ने "बम का दर्शन" नाम से लेख लिखा जिसे भगत सिंह ने जेल में अंतिम रूप दिया।
लेख में हिंसा और अहिंसा पर विस्तार से लिखा गया। इसके साथ ही क्रांतिकारी मंसूबे जाहिर किये गए जिससे देश ही नही मानवता की आजादी का रास्ता क्या हो स्पष्ठ किया गया। लेख में गांधी जी के विचार की तार्किक आलोचना बड़ी ही मजबूती से की गई इससे पहले सायद ही किसी ने गांधी जी के विचार की ऐसी तार्किक आलोचना खुले मंच से की हो।
लेकिन पूरे लेख में एक भी शब्द महात्मा गांधी के व्यक्तिगत तौर पर खिलाफ नही लिखा गया। इसके विपरीत महात्मा गांधी को जनता का नेतृत्व करने वाला इंसान बताया। क्रांतिकारी तबका महात्मा गांधी की बजाए साम्प्रदायिक व सामन्तवादियों को क्रांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा मानता था जिसका नेतृत्व हिंदुत्त्ववादी ताकते कर रही थी।
अब हम 2019 पर आते हैं। आज वर्तमान में हम भगत सिंह को आदर्श मानने वाले किसी से भी जब महात्मा गांधी के बारे में पूछते हैं तो वो गांधी से नफरत करता मिलेगा।
हम डॉ अम्बेडकर को आदर्श मानने वाले से बात करेंगे तो वो गांधी को गालियां देता मिलेगा। कांग्रेसियों से बात करो वो भी दबी जुबान बोलते मिलेंगे की गांधी ने ही सारा नाश किया है।
हिन्तुत्ववादी टोली तो गांधी विरोध करेगी ही क्योकि वो तो उसकी हत्या में सीधा-सीधा शामिल ही थी।
गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सबको मालूम था कि महात्मा की हत्या किसने और क्यों कि
साम्प्रदायिक ताकतों ने बड़ी ही चतुराई और झूठ का सहारा लेते हुए भगत सिंह, डॉ अम्बेडकर को मानने वाले और यहाँ तक गांधीवाद के सहारे सत्ता हासिल करने वाली कॉग्रेस कार्यकर्ताओ को गांधी के विरोध में खड़ा कर दिया।
हिंदुत्त्ववादी ताकते जिनका देश की आजादी की लड़ाई में योगदान शून्य था इसके विपरीत वो अंग्रेजो के साथ ही खड़े रहे, अंग्रेजो के मुखबिर का काम करते रहे।
देश आजाद होते ही सत्ता हासिल कैसे हो। इसके लिए उन्होंने धर्म के नाम पर दंगे करवाये। गांधी जी जहां भी जाते लोगो से दंगे न करने की अपील करते और वहीं दंगे बन्द हो जाते। हिंदुत्ववादी ताकतों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा महात्मा जी बन गए थे इसके लिए उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। लेकिन हत्या के बाद भी गांधी जी का विचार हिंदुत्त्वादी ताकतों की राह में रोड़ा बना हुआ था। इसके लिए उन्होंने गांधी के विचार को मारने के लिए 2 रास्ते अपनाये एक रास्ता गांधी के नाम जपने का, कांग्रेसियो की चापलूसी करने का और दूसरा रास्ता गांधी के खिलाफ झूठा दुष्प्रचार करने का इन दोनों रास्तो में वो कामयाब होते गए। वर्तमान में अगर फासीवादी और साम्प्रदायिक टोली सत्ता में बैठी है तो ये उसी मेहनत का फल है।
महात्मा जी की हत्या से आज तक हत्यारी टोली गांधी के विचार को मारने के लिए संगठित तौर पर मजबूती से मेहनत किये हुए है। उनकी मेहनत का ही नतीजा है जिस कारण भगत सिंह, डॉ अंबेडकर, नेहरू को आदर्श मानने वाले आज गांधी को गालियां दे रहे है व ठीक इसके विपरीत वो नाथूराम गोड़से और उसकी हत्यारी टोली को सपोर्ट करते मिलते है।

लेकिन गांधी के विचार की असलियत में हत्या किसने की इसका गम्भीर और पेचीदा सवाल ये भी है कि गांधी खेमे के नेताओ ने जो लंबे समय तक सरकार में भी रहे जिनकी नाकामियों ने भी गांधी जी के विचार को मारने का काम किया है। जिसका सीधा जिम्मेदार नेहरू और उसके बाद आने वाला कांग्रेस नेतृत्व है।
देश की आजादी के दौर में चला हुआ तेलगांना, तेभागा का हथियार बन्द क्रांतिकारी आंदोलन जो "जमीन जोतने वाले की" के लिए सामन्तवादी ताकतों से लड़ रहे थे। इस आंदोलन को देश की आजादी के बाद भारतीय सत्ता द्वारा सत्ता की हिंसा के बल पर निर्ममता से कुचलना गांधी जी के विचार की हत्या कॉग्रेस नेतृत्व द्वारा शुरुआत थी। 1962 के चीन युद्ध के बाद नेहरू ने अपने राजनीतक स्वार्थ के लिए गांधी की हत्या करने वाली हिंदुत्ववादी गैंग को सम्मानित किया। नेहरू का ये कृत्य महात्मा गांधी जी की पीठ में छुरा घोंपने जैसा था।
उसके बाद जितनी भी सरकारे आयी उन सभी ने राजनीतिक स्वार्थ के कारण गांधी जी की हर बार हत्या करते रहे। चाहे वो नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलना हो या सिख दंगे हो या आदिवासियों का कत्लेआम हो। ये सब गतिविधियां गांधी जी की विचारधारा अहिंसा के खिलाफ सत्ता की हिंसा थी। जो पार्टी गांधी का मूल मंत्र अहिंसा को सर्वोपरि मानने का दम भरती रही उसी पार्टी ने समय-समय पर सत्ता की हिंसा और संघठन की हिंसा का सहारा लिया।
ऐसे ही डॉ अम्बेडकर के नाम पर स्वार्थ की राजनीति करने वाली बसपा जिसने गांधी को डॉ अम्बेडकर के दुश्मन के रूप में पेश किया। बसपा ने अपने कार्यकर्ताओं को साम्प्रदायिक संघ और उसकी टोली के खिलाफ कम व गांधी के खिलाफ ज्यादा जागरूक किया। ज
प्रगतिशील ताकते भी आवाम को ये समझाने में नाकामयाब रही कि भगत सिंह के विचार की सबसे बड़ी दुश्मन साम्प्रदायिक व फासीवादी विचारधारा थी। जिसका नेतृत्व संघ, हिन्दू महासभा एवं मुश्लिम लीग कर रहे थे न कि गांधी।

आज जब साम्प्रदायिक ताकते सत्ता में बैठ कर खुला नंगा नाच कर रही है। बुद्विजीवियों, कलाकारों, नाटककारों, दलितों, मुश्लिमो को मारा जा रहा है। गांधी को गोली मारने का एक बार फिर खुला मंचन किया जा रहा है। गांधी की फेक अश्लील तस्वीरे बनाकर शोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है। गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की कोशिशें हो या हत्या का मास्टरमाइंड की संसद में फोटो लगी हो। लेकिन जो अपने आपको गांधी के पक्ष में बताते नही थकते क्या उन्होंने कही भी विरोध में ईमानदारी से कुछ किया?
क्या इसका जवाब ये है कि गांधी की विचार धारा जो साम्प्रदायिकता के खिलाफ थी। गांधी की हत्या के बाद से आज तक खुद कॉग्रेस साम्प्रदायिकता का कार्ड खेलती रही है। भारत मे हुए सिख विरोधी दंगे क्या कॉग्रेस पर एक काला दाग नही है।

कॉग्रेस अध्यक्ष जिसका नेतृत्व वर्तमान में राहुल गाँधी कर रहे है। अगर वो ईमानदारी से गांधी की विचारधारा पर चलने का दम भरते हैं तो -
● क्या माफी मांगने की चेष्ठा करेगे उन लाखों तेभागा, तेलगांना, नक्सलबाड़ी के किसानों से जिनको अपना हक मांगने के कारण सत्ता ने हिंसा से कुचल दिया।
● क्या कभी उन लाखों सिखों से माफी मांगने का कष्ट करेंगे जो उन दंगो में मारे गए या उजाड़े गए।
● क्या राहुल गांधी कभी उन हजारो आदिवासी परिवारों से माफी मांगने का कष्ट करेंगे जिनको 2004 से 2014 के बीच केंद्र में कॉग्रेस सरकार के नेतृत्व में उजाड़ दिया गया या मार दिया गया।
● क्या माफी मांगने का मादा है सोनी सोरी से जिसकी योनि में पत्थर भरने का काम इनकी केंद्र सरकार में हुआ उनको जेल में असहनीय यातनाएं दी गयी। ये सब जुल्म करने वालो को इनकी सरकार ने वीरता पुरष्कार दिए।
● क्या राहुल गांधी माओवादी विचारक कामरेड आजाद जिसको गांधी जी के अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले बुद्विजीवियों के आग्रह पर सरकार ने बातचीत के लिए बुलाया और फिर सरकार ने आजाद की फेक इनकाउंटर में हत्या कर दी। एक क्रांतिकारी और शांतिवार्ता के लिए आये दूत की हत्या पर सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने का कष्ट करेगें?
गांधी जी तो खुद ये मानते थे कि कभी भी अपनी गलतियों को स्वीकार करके सच्चाई के रास्ते आगे बढ़ा जा सकता है। क्या राहुल गांधी में है सच्चाई के रास्ते पर चलने का मादा।
अगर ये सब राहुल गांधी नही कर सकते तो वो खुद कांग्रेस अध्यक्ष होते हुए उतने ही दोषी है महात्मा के विचार को मारने में जितनी हिंदुत्त्वादी गैंग दोषी है।

आज महात्मा गांधी की विचारधारा से भिन्नता होते हुए भी गांधी को बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारत के उन असँख्य बुद्विजीवियों, कलाकारों, नाटककारों, क्रान्तिकारी जमातों के कंधे पर है। जो गैर बराबरी, शोषण, अन्याय के खिलाफ ओर मानवता के लिए लड़ लड़ रहे है। इसलिए उन सभी को मजबूती से इस पक्ष पर बात करनी चाहिए। मजबूती से लड़ना चाहिए।
Uday Che




लेकिन उसके विचार को नही मार सकते हो"

हत्यारी सोच ये जानती थी इसलिए उन्होंने सबसे पहले गांधी को मारा, गांधी की सोच को मारने के लिए वो पिछले 70 सालों से लगे हुए है। बहुत हद तक वो कामयाब भी हुए है। ऐसी हत्यारी सोच कामयाब कैसे हुई ये सोचना आज जरूरी है।
सबसे पहले तो उस समय की महान सख्सियत थी उनको जान ले।
1. जवाहर लाल नेहरू
2. डॉ अम्बेडकर
3. सरदार पटेल

ये तीनों जो उस समय कॉग्रेस के पदाधिकारी व भारत सरकार और भारत की बहुमत जनता का नेतृत्व कर रहे थे। ये सब गांधी जी के अनुयायी थे। उनको पूजनीय मानते थे। इन सबकी बहुत से मुद्दों पर गांधी जी से असहमतियां थी लेकिन फिर भी ये महात्मा जी के साथ खड़े थे।
आवाम का एक बड़ा तबका जिसका नेतृत्व क्रांतिकारी विचारधारा का नेतृत्व करने वाले भगतसिंह और उसके साथी कर रहे थे।
जब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन के साथियों ने अपनी पार्टी लाईन के अनुसार 23 दिसंबर, 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वाइसराय की गाड़ी को उड़ाने का प्रयास किया, जो असफल रहा। गाँधी जी ने इस घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख "बम की पूजा" लिखा, जिसमें उन्होनें वाइसराय को देश का शुभचिंतक और नवयुवकों को आजादी के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले कहा। महात्मा जी के इस लेख के जवाब में भगवती सिंह वोहरा ने "बम का दर्शन" नाम से लेख लिखा जिसे भगत सिंह ने जेल में अंतिम रूप दिया।
लेख में हिंसा और अहिंसा पर विस्तार से लिखा गया। इसके साथ ही क्रांतिकारी मंसूबे जाहिर किये गए जिससे देश ही नही मानवता की आजादी का रास्ता क्या हो स्पष्ठ किया गया। लेख में गांधी जी के विचार की तार्किक आलोचना बड़ी ही मजबूती से की गई इससे पहले सायद ही किसी ने गांधी जी के विचार की ऐसी तार्किक आलोचना खुले मंच से की हो।
लेकिन पूरे लेख में एक भी शब्द महात्मा गांधी के व्यक्तिगत तौर पर खिलाफ नही लिखा गया। इसके विपरीत महात्मा गांधी को जनता का नेतृत्व करने वाला इंसान बताया। क्रांतिकारी तबका महात्मा गांधी की बजाए साम्प्रदायिक व सामन्तवादियों को क्रांति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा मानता था जिसका नेतृत्व हिंदुत्त्ववादी ताकते कर रही थी।
अब हम 2019 पर आते हैं। आज वर्तमान में हम भगत सिंह को आदर्श मानने वाले किसी से भी जब महात्मा गांधी के बारे में पूछते हैं तो वो गांधी से नफरत करता मिलेगा।
हम डॉ अम्बेडकर को आदर्श मानने वाले से बात करेंगे तो वो गांधी को गालियां देता मिलेगा। कांग्रेसियों से बात करो वो भी दबी जुबान बोलते मिलेंगे की गांधी ने ही सारा नाश किया है।
हिन्तुत्ववादी टोली तो गांधी विरोध करेगी ही क्योकि वो तो उसकी हत्या में सीधा-सीधा शामिल ही थी।
गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सबको मालूम था कि महात्मा की हत्या किसने और क्यों कि
साम्प्रदायिक ताकतों ने बड़ी ही चतुराई और झूठ का सहारा लेते हुए भगत सिंह, डॉ अम्बेडकर को मानने वाले और यहाँ तक गांधीवाद के सहारे सत्ता हासिल करने वाली कॉग्रेस कार्यकर्ताओ को गांधी के विरोध में खड़ा कर दिया।
हिंदुत्त्ववादी ताकते जिनका देश की आजादी की लड़ाई में योगदान शून्य था इसके विपरीत वो अंग्रेजो के साथ ही खड़े रहे, अंग्रेजो के मुखबिर का काम करते रहे।
देश आजाद होते ही सत्ता हासिल कैसे हो। इसके लिए उन्होंने धर्म के नाम पर दंगे करवाये। गांधी जी जहां भी जाते लोगो से दंगे न करने की अपील करते और वहीं दंगे बन्द हो जाते। हिंदुत्ववादी ताकतों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा महात्मा जी बन गए थे इसके लिए उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। लेकिन हत्या के बाद भी गांधी जी का विचार हिंदुत्त्वादी ताकतों की राह में रोड़ा बना हुआ था। इसके लिए उन्होंने गांधी के विचार को मारने के लिए 2 रास्ते अपनाये एक रास्ता गांधी के नाम जपने का, कांग्रेसियो की चापलूसी करने का और दूसरा रास्ता गांधी के खिलाफ झूठा दुष्प्रचार करने का इन दोनों रास्तो में वो कामयाब होते गए। वर्तमान में अगर फासीवादी और साम्प्रदायिक टोली सत्ता में बैठी है तो ये उसी मेहनत का फल है।
महात्मा जी की हत्या से आज तक हत्यारी टोली गांधी के विचार को मारने के लिए संगठित तौर पर मजबूती से मेहनत किये हुए है। उनकी मेहनत का ही नतीजा है जिस कारण भगत सिंह, डॉ अंबेडकर, नेहरू को आदर्श मानने वाले आज गांधी को गालियां दे रहे है व ठीक इसके विपरीत वो नाथूराम गोड़से और उसकी हत्यारी टोली को सपोर्ट करते मिलते है।

लेकिन गांधी के विचार की असलियत में हत्या किसने की इसका गम्भीर और पेचीदा सवाल ये भी है कि गांधी खेमे के नेताओ ने जो लंबे समय तक सरकार में भी रहे जिनकी नाकामियों ने भी गांधी जी के विचार को मारने का काम किया है। जिसका सीधा जिम्मेदार नेहरू और उसके बाद आने वाला कांग्रेस नेतृत्व है।
देश की आजादी के दौर में चला हुआ तेलगांना, तेभागा का हथियार बन्द क्रांतिकारी आंदोलन जो "जमीन जोतने वाले की" के लिए सामन्तवादी ताकतों से लड़ रहे थे। इस आंदोलन को देश की आजादी के बाद भारतीय सत्ता द्वारा सत्ता की हिंसा के बल पर निर्ममता से कुचलना गांधी जी के विचार की हत्या कॉग्रेस नेतृत्व द्वारा शुरुआत थी। 1962 के चीन युद्ध के बाद नेहरू ने अपने राजनीतक स्वार्थ के लिए गांधी की हत्या करने वाली हिंदुत्ववादी गैंग को सम्मानित किया। नेहरू का ये कृत्य महात्मा गांधी जी की पीठ में छुरा घोंपने जैसा था।
उसके बाद जितनी भी सरकारे आयी उन सभी ने राजनीतिक स्वार्थ के कारण गांधी जी की हर बार हत्या करते रहे। चाहे वो नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलना हो या सिख दंगे हो या आदिवासियों का कत्लेआम हो। ये सब गतिविधियां गांधी जी की विचारधारा अहिंसा के खिलाफ सत्ता की हिंसा थी। जो पार्टी गांधी का मूल मंत्र अहिंसा को सर्वोपरि मानने का दम भरती रही उसी पार्टी ने समय-समय पर सत्ता की हिंसा और संघठन की हिंसा का सहारा लिया।
ऐसे ही डॉ अम्बेडकर के नाम पर स्वार्थ की राजनीति करने वाली बसपा जिसने गांधी को डॉ अम्बेडकर के दुश्मन के रूप में पेश किया। बसपा ने अपने कार्यकर्ताओं को साम्प्रदायिक संघ और उसकी टोली के खिलाफ कम व गांधी के खिलाफ ज्यादा जागरूक किया। ज
प्रगतिशील ताकते भी आवाम को ये समझाने में नाकामयाब रही कि भगत सिंह के विचार की सबसे बड़ी दुश्मन साम्प्रदायिक व फासीवादी विचारधारा थी। जिसका नेतृत्व संघ, हिन्दू महासभा एवं मुश्लिम लीग कर रहे थे न कि गांधी।

आज जब साम्प्रदायिक ताकते सत्ता में बैठ कर खुला नंगा नाच कर रही है। बुद्विजीवियों, कलाकारों, नाटककारों, दलितों, मुश्लिमो को मारा जा रहा है। गांधी को गोली मारने का एक बार फिर खुला मंचन किया जा रहा है। गांधी की फेक अश्लील तस्वीरे बनाकर शोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है। गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की कोशिशें हो या हत्या का मास्टरमाइंड की संसद में फोटो लगी हो। लेकिन जो अपने आपको गांधी के पक्ष में बताते नही थकते क्या उन्होंने कही भी विरोध में ईमानदारी से कुछ किया?
क्या इसका जवाब ये है कि गांधी की विचार धारा जो साम्प्रदायिकता के खिलाफ थी। गांधी की हत्या के बाद से आज तक खुद कॉग्रेस साम्प्रदायिकता का कार्ड खेलती रही है। भारत मे हुए सिख विरोधी दंगे क्या कॉग्रेस पर एक काला दाग नही है।

कॉग्रेस अध्यक्ष जिसका नेतृत्व वर्तमान में राहुल गाँधी कर रहे है। अगर वो ईमानदारी से गांधी की विचारधारा पर चलने का दम भरते हैं तो -
● क्या माफी मांगने की चेष्ठा करेगे उन लाखों तेभागा, तेलगांना, नक्सलबाड़ी के किसानों से जिनको अपना हक मांगने के कारण सत्ता ने हिंसा से कुचल दिया।
● क्या कभी उन लाखों सिखों से माफी मांगने का कष्ट करेंगे जो उन दंगो में मारे गए या उजाड़े गए।
● क्या राहुल गांधी कभी उन हजारो आदिवासी परिवारों से माफी मांगने का कष्ट करेंगे जिनको 2004 से 2014 के बीच केंद्र में कॉग्रेस सरकार के नेतृत्व में उजाड़ दिया गया या मार दिया गया।
● क्या माफी मांगने का मादा है सोनी सोरी से जिसकी योनि में पत्थर भरने का काम इनकी केंद्र सरकार में हुआ उनको जेल में असहनीय यातनाएं दी गयी। ये सब जुल्म करने वालो को इनकी सरकार ने वीरता पुरष्कार दिए।
● क्या राहुल गांधी माओवादी विचारक कामरेड आजाद जिसको गांधी जी के अहिंसा के रास्ते पर चलने वाले बुद्विजीवियों के आग्रह पर सरकार ने बातचीत के लिए बुलाया और फिर सरकार ने आजाद की फेक इनकाउंटर में हत्या कर दी। एक क्रांतिकारी और शांतिवार्ता के लिए आये दूत की हत्या पर सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने का कष्ट करेगें?
गांधी जी तो खुद ये मानते थे कि कभी भी अपनी गलतियों को स्वीकार करके सच्चाई के रास्ते आगे बढ़ा जा सकता है। क्या राहुल गांधी में है सच्चाई के रास्ते पर चलने का मादा।
अगर ये सब राहुल गांधी नही कर सकते तो वो खुद कांग्रेस अध्यक्ष होते हुए उतने ही दोषी है महात्मा के विचार को मारने में जितनी हिंदुत्त्वादी गैंग दोषी है।

आज महात्मा गांधी की विचारधारा से भिन्नता होते हुए भी गांधी को बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भारत के उन असँख्य बुद्विजीवियों, कलाकारों, नाटककारों, क्रान्तिकारी जमातों के कंधे पर है। जो गैर बराबरी, शोषण, अन्याय के खिलाफ ओर मानवता के लिए लड़ लड़ रहे है। इसलिए उन सभी को मजबूती से इस पक्ष पर बात करनी चाहिए। मजबूती से लड़ना चाहिए।
Uday Che
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