दुनिया भर के एचआइवी संक्रमित लोगों में भारत तीसरे स्थान पर है. एक नया ऐप वहां एचआइवी पॉजिटिव ट्रांसजेंडर लोगों के इलाज में मदद कर रहा है.
| 29 Oct 2019

ट्रांसजेंडर होने की वजह से निशा का अस्पताल जाना हमेशा तकलीफदेह होता था. उन्हें धक्का-मुक्की, अपशब्द और उपहास का सामना करना पड़ता था. एचआइवी पॉजिटिव पाए जाने के बाद हालात और खराब हो गए. लेकिन एक नए ऐप ने उनकी और ट्रांसजेंडर समुदाय की डॉक्टरों और जीवन बचाने वाली दवाओं तक पहुंचने की परेशानी को कम कर दिया है. डिजिटल निजता को लेकर चिंताएं जरूर उभरी हैं, पर इस ऐप ने उन्हें उम्मीद भी दी है.

संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएड्स के मुताबिक, भारत में एचआइवी संक्रमित लोगों की विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आबादी है. ट्रांसजेंडर समुदाय को खासकर मदद चाहिए क्योंकि उनमें इसका प्रसार 3.1 प्रतिशत है जबकि कुल वयस्कों में इसका प्रसार 0.26 प्रतिशत है.

निशा को पिछले साल एचआइवी पॉजिटिव पाया गया. वे ट्रांसजेंडर हैं और नई दिल्ली में बतौर यौनकर्मी अपनी जीविका चलाती हैं. उन्होंने बताया कि उनके ग्राहकों के कंडोम अक्सर फट जाते थे. कई बार वो ज्यादा पैसों के लालच में कंडोम का इस्तेमाल नहीं भी करती थी. 29 वर्षीय निशा ने बताया, “ये एक बड़ी गलती थी. मुझे एचआइवी संक्रमण हो गया. जब मुझे पता चला तब आत्महत्या जैसे ख्याल आए.” निशा कहती है, “उसके ऊपर से अस्पताल जाना और भी दुखदायी था. लोग मुंह बनाते थे, भद्दी बातें करते थे…एक डॉक्टर ने मुझे लात मार के बाहर भी निकाल दिया था.”

तीसरा लिंग

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने देश के 20 लाख ट्रांसजेंडर लोगों को 2014 में तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी थी और उनके बराबरी के अधिकार को स्वीकारा था. इसके बावजूद, उन्हें अक्सर उनके परिवार वाले घर से बाहर निकल देते हैं और उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और नौकरियां देने से मना कर दिया जाता है. नतीजा ये होता है कि वो या तो भीख मांगने लगते हैं या यौनकर्मी बन जाते हैं. निशा कहती हैं कि उन्हें दोहरे भेदभाव, अलगाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है, पहले तो ट्रांसजेंडर होने की वजह से और फिर एचआइवी पॉजिटिव होने की वजह से.

एक स्वास्थ्य संबंधी सलाह कार्यक्रम और ऐप की मदद से स्वास्थ्यकर्मी एचआइवी पॉजिटिव ट्रांसजेंडर लोगों को ढूंढ पा रहे हैं, उनके इलाज की निगरानी कर पा रहे हैं और एड्स वायरस को दबाने के लिए उन्हें डॉक्टरों और एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) के संपर्क में भी ला पा रहे हैं. अब ट्रैफिक सिग्नलों पे भीख मांगने वाली निशा कहती है, “मुझे एक नई ताकत मिली है. मुझे अब बिलकुल भी उदासीनता या घबराहट का एहसास नहीं होता.” एम्पावर ऐप को आईबीएम ने इंडिया एचआइवी/एड्स अलायन्स और ग्लोबल फण्ड टू फाइट एड्स, ट्यूबरक्लोसिस एंड मलेरिया के साथ भागीदारी में विकसित किया है. इस ऐप ने जनवरी 2018 और मार्च 2019 के बीच 12 लाख से भी ज्यादा लोगों की निगरानी की है.

एचआईवी के खिलाफ जंग

हाथों में मोबाइल टेबलेट लिए एचआइवी पॉजिटिव ट्रांसजेंडर आउटरीच कर्मी अपने समुदाय में एचआइवी के साथ जी रहे और लोगों पर नजर रखते हैं, उन्हें सलाह देते हैं और उनके साथ डॉक्टरों के पास जाते हैं. आउटरीच कर्मी समाइरा कहती हैं, “मैं उन्हें बताती हूं कि मैं तुम्हारे जैसी ही हूं. मैं एचआइवी पॉजिटिव हूं और मैं दवाएं भी ले रही हूं. तुम अकेली नहीं हो.” वह विहान नाम की एक संस्था के साथ काम करती हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर एचआइवी पॉजिटिव लोगों के बीच सलाह, आउटरीच और फॉलो अप कार्यक्रमों के विस्तार के लिए काम कर रही है. समाइरा ये भी कहती हैं, “इससे बहुत अंतर पड़ता है क्योंकि ये बात उनके जैसा ही कोई उनसे कह रहा है. अगर पूरे रास्ते कोई आपका हाथ पकड़ने वाला साथ हो, तो एचआइवी के खिलाफ जंग में आधी जीत वैसे ही हो जाती है”.

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की पहल की मदद से भारत 2030 तक इस महामारी से छुटकारा पाने के अपने लक्ष्य तक बढ़ रहा है. लेकिन उनका ये भी कहना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ये जरूरी है कि मरीज लगातार एआरटी करवाते रहें. इसीलिए स्वास्थ्यकर्मी मरीजों के साथ लगातार जुड़े रहते हें और हर कुछ महीनों पर उनसे मिलकर उनकी जानकारी एम्पावर ऐप पर डालते रहते हैं. साथ में हर तरह की सलाह भी देते हैं.

दो-धारी तलवार

जहां इस तरह के तकनीकी प्रयासों की एचआइवी और एड्स के खिलाफ जंग में अहम भूमिका है, वहीं स्वास्थ्य और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इसका खामियाजा निजता को न भुगतना पड़े. एम्पावर ऐप पर हर मरीज की जो जानकारी जाती है अगर उसे सुरक्षित नहीं रखा गया तो जानकारी के चोरी हो जाने का खतरा है. इससे पहले ही हाशिए पर धकेल दिए गए इन लोगों को और भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. ये कहना है साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अम्बिका टंडन का.

लेकिन इंडिया एचआइवी/एड्स अलायन्स के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी सरवनन आरएम का कहना है कि एम्पावर ऐप एक अभेद्य सिस्टम है. उनका कहना है कि सारी संवेदनशील जानकारी एक सर्वर पर रहती है जो पासवर्ड के पीछे सुरक्षित है और इसे देखने की भी सिर्फ कुछ ही कर्मियों को इजाजत है. एड्स हेल्थकेयर फाउंडेशन के इंडिया प्रोग्राम मैनेजर डॉक्टर सैम प्रसाद का कहना है कि निजता की चिंताओं की वजह से इस ऐप को खारिज नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके कई लाभ हैं. स्वाति जैसे कई एचआइवी पॉजिटिव ट्रांसजेंडर लोगों का भी यही मानना है. वो कहती हैं, “मेरी निजी जानकारी चोरी भी हो गई तो सबसे बुरा क्या हो सकता है? मैंने अकल्पनीय यातनाएं सही हैं. मैं अब किसी चीज से नहीं डरती. कम से कम इससे तो बिलकुल नहीं.” वे कहती हैं, “ये ऐप मुझे बचा रहा है. ये मेरा दुश्मन नहीं है.”

साभार : समाचार माध्यम