सविंधान जलाने वालो पर कोई कार्यवाही नहीं : सतपाल तंवर
| 28 Nov 2019

दिनांक 9 अगस्त 2018 को आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन करते हुए भाजपा और आरएसएस से जुड़े मनुवादी आतंकवादियों ने भारत देश के संविधान की प्रतियां फाड़ी और जलाई थी। साथ ही एससी/एसटी मुर्दाबाद, अम्बेडकर मुर्दाबाद, चमार मुर्दाबाद, आरक्षण हटाओ देश बचाओ और संविधान जलाओ के नारे लगाए थे। आपके अपने संगठन अखिल भारतीय भीम सेना और निगाहें (एक नया बदलाव) ने मामले पर तुरंत संज्ञान लेते हुए दिनांक 10 अगस्त 2018 को आईपीसी की धारा 153A, 505, 34 और PREVENTION OF INSULT TO NATIONAL HONOURS ACT 1971 Section 2, Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act 1989 Section 3 (1) (10) में FIR NO. 0075 दर्ज कराई। अखिल भारतीय भीम सेना और निगाहें (एक नया बदलाव) संगठन के राष्ट्रीय प्रभारी माननीय अनिल तंवर जी की शिकायत पर DCP NEW DELHI POLICE मधुर वर्मा जी ने मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए। मुकदमा दर्ज कराने में बहुजन समाज के साथियों ने भी भीम सेना का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। कुल 12 लोगों को देशद्रोह में नामजद किया गया। दिल्ली पुलिस की छापेमारी के बाद संविधान जलाने वाले 4 देशद्रोही आतंकवादियों अभिषेक शुक्ला, दीपक गौड़, संतोष शुक्ला और श्रीनिवास पांडेय उर्फ गुरुजी को गिरफ्तार करके तिहाड़ जेल भेजा गया।

मामले में पूरा एक साल बीत चुका है। लेकिन दिल्ली पुलिस अदालत में चार्जशीट पेश नहीं कर पा रही है। इस प्रक्रिया में रोड़ा अटकाने का काम दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने किया है। दरअसल दिल्ली के मुख्यमत्री अरविंद केजरीवाल जी संविधान जलाने के आरोपियों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दे रही है। इस पर बहुत से लोग ये कहेंगे कि चालान पेश करने का काम सिर्फ पुलिस का होता है इसमें सरकार को कोई रोल नहीं होता। बहुत से लोग ये कहेंगे कि दिल्ली पुलिस दिल्ली सरकार के अधीन नहीं बल्कि केंद्र सरकार के अधीन काम करती है। अब इन सवालों से भी आपके भैयाजी नवाब सतपाल तंवर पर्दा उठा देते हैं। जोकि एक अहम कानूनी जानकारी भी है जिसे जानना बेहद आवश्यक है।

दरअसल कोई भी मुकदमा किसी पर भी किसी भी आईपीसी धारा या किसी भी अधिनियम में दर्ज होता है तो पुलिस अदालत में तय समय सीमा के भीतर चालान पेश करती है जिसमें जांच अधिकारी को किसी की भी अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। जांच अधिकारी के चालान तैयार करने के बाद थाना अधिकारी के हस्ताक्षर होते हैं और अदालत में चालान पेश कर दिया जाता है।

परन्तु ध्यान दें कि देशद्रोह के मामले में ऐसा नहीं होता।
देशद्रोह के मामले में राज्य सरकार की अनुमति लेना अनिवार्य है। ठीक ऐसे ही संविधान जलाने के मामले में दिल्ली सरकार ने देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी है। दिल्ली सरकार की अनुमति नहीं मिलने पर अदालत चार्जशीट में देशद्रोह वाली धारा पर संज्ञान नहीं ले सकती। अगर दिल्ली सरकार ने अनुमति नहीं दी तो देशद्रोह की धारा स्वत: समाप्त हो जाएगी। दिल्ली सरकार की अनुमति लिए बिना ही यदि चार्जशीट दाखिल कर दी जाती है तो अदालत मामले पर सुनवाई नहीं करेगी।

देशद्रोह की धारा में अदालत सीआरपीसी की धारा 196 के तहत तभी संज्ञान ले सकती है, जब दिल्ली सरकार की अनुमति मिली हो।
इसके बिना अदालत देशद्रोह की धारा पर संज्ञान नहीं लेगी और यह स्वत: समाप्त हो जाएगी। दिल्ली सरकार की अनुमति न मिलने की स्थिति में कोर्ट देशद्रोह की धारा छोड़कर अन्य धाराओं पर संज्ञान लेगा।

देशद्रोह की धारा में तीन वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की सजा है। आरोप साबित होने पर आरोपियों की नागरिकता भी रद्द की जा सकती है। आरोपियों की नागरिकता रद्द कराने के लिए अखिल भारतीय भीम सेना भारत सरकार और महामहिम राष्ट्रपति महोदय को पत्र लिख चुकी है। देशद्रोह केस में एक ओर टर्निंग प्वाइंट है कि समय से कोर्ट में चार्जशीट दाखिल नहीं की जाती तो देशद्रोह की धारा टिकती नहीं। जबकि पूरे एक साल से केजरीवाल सरकार ने केस को रोक रखा है और देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी है। इससे साबित होता है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी आरएसएस और भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं।

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