काशी हिंदू वि वि जाति वाद , सांप्रदायिकता और फासिज्म का केंद्र : बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी या ब्राह्मण हिंदू यूनिवर्सिटी . R.B Yadav , Sr. Journalist
| 29 Nov 2019

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एक अकादमिक संस्था ही नहीं एक मनुवादी फासिस्ट सोच भी है जो सरकारी पैसे पर फल- फूल रही है ।

आजकल BHU में SVDV( संस्कृत विद्या धर्म विग्यान संकाय मे एक मुश्लिम का असिस्टेंट प्रोफेसर पर नियुक्ति विवाद का विषय बन गयी है । एक जाति विशेष के छात्र और टीचर इस नियुक्ति के खिलाफ विश्व विद्यालय में क्लास बंद कराकर धरना और प्रदर्शन कर रहे हैं। सेकुलर संविधान में भी एक विशेष बिषय मे एक विशेष जाति के लोग एक विशेष धर्म के व्यक्ति के नियुक्ति का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि कोई मुसलमान तथाकथित हिंदू वि. वि. संस्कृत कैसे पढ़ा सकता है । वे किसी पत्थर के शिलापट्ट का हवाला देकर कह रहे हैं कि तथाकथित महामना ने यह शिलापट्ट लगवाया है।
जबकि...
सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के एक्ट्स में यह धारा संसद द्वारा जोड़ी गई है..
(नीचे BHU Act की धारा 4 है -
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4. UNIVERSITY OPEN TO ALL RACES, CREED, CASTES OR CLASSES The university shall be open to persons of either sex and of whatever race, creed, caste or class, and it shall not be lawful for the University to adopt or impose on any person any test whatsoever of religious belief or profession in order to entitle him to be admitted therein, as a teacher or student, or to hold any office therein, or to graduate there at, or to enjoy or exercise any privilege there of, except in respect of any particular benefaction accepted by the University, where such a test is made a condition thereof by any testamentary or other instrument creating such benefaction ; Provided that nothing in this section shall be deemed to prevent religious instruction being given in the manner prescribed by the Ordinances to those who, or, in the case of minors, whose parents or guardians have given their consent thereto in writing.

मेरे सैकड़ो मित्रों ने हमसे आग्रह किया था कि मैं इस पर लिखूं। हमे dangue हो गया था अत: नहीं लिख पाया था । अब स्वस्थ हुआ हूं तो लिख रहा हूं। मै १९७५ से इस वि.वि. से जुड़ा हूं , जो देखा, जो पढ़ा , जो महसूस किया , उसे लिख रहा हूं । हमे पता है कि मेरे लेख पर कुछ विशेष लोगों को बहुत कष्ट होगा। ये पहली घटना नहीं है , ये तो फिरोज खान हैं , इसके पहले महादेवी वर्मा को भी इसी संकाय में शूद्र और स्त्री होने के कारण प्रवेश नही दिया गया था । ये बात महादेवी वर्मा ने स्वयं इसी वि. वि. में जब ग्यान पीठ पुरस्कार पाने के बाद आयीं थी तो बतायी थी, उन्होंने ही पं मदन मोहन मालवीय को तथाकथित महामना कहा था। भारत कला भवन की उस सभा में मैं पहली कतार में बैठा था और सुना।

महादेवी वर्मा जैसी महिला को प्राच्य विद्या धर्म विज्ञान संकाय में संस्कृत विषय में दाखिला नहीं लेने दिया गया था ।मनुस्मृति कहती है ....
"नारी च शूद्राम विध्या न दताम"
अर्थात- नारी और शूद्र को विद्या मत दो,
इसी को आधार मानकर मालवीय ने महादेवी का प्रवेश SDVD में नही लिया....

तब विवश हो कर महादेवी वर्मा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी में दाखिला लिया । दाखिला यह कह और लिखकर अस्वीकार किया गया कि स्त्री और शूद्रा धर्मशास्त्र पढ़ने की अधिकारिणी नहीं है ।
जब महादेवी वर्मा को ग्यान पीठ पुरस्कार मिला तो उनको बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी मे सम्मानित करके बुलाया गया था । ठीक से बर्ष याद नही आ रहा है ,शायद 1982 था। ग्यानपीठ पुरस्कार के तुरंत बाद। भारतकला भवन मे प्रोग्राम था। मै भी अगली कतार में बैठा था। हाल मे सब लोग जमीन पर बिछी दरी पर ही बैठे थे । हाल खचाखच भरा था । महादेवी वर्मा उस समय के साहित्य मे एक जानी मानी हस्ती थी।
विश्व विद्यालय की एक परंपरा है कोई प्रोग्राम हो मदन मोहन मालवीय की एक प्रतिमा या मूर्ति रखकर उस पर बारी बारी से माल्यार्पण कराया जाता है। इसका लक्ष्य सबको मालवीय अनुयायी साबित करना होता है। ब्यक्तिगत रुप से जो मालवीय के कुटिलता की जगह जगह चर्चा करते है,उनको पब्लिक प्लेस पर ऐसे कार्यक्रम मे सबसे पहले माल्यार्पण के लिये बुलाया जाता है और वह ब्यक्ति न चाहते हुये भी मना नही कर पाता। ऐसे ही बहुत देर से माल्यार्पण का कार्य जारी था। लिस्ट खतम ही नही हो रही थी। मै सबसे आगे बैठा था। मेरे ठीक सामने महादेवी जी बार्डर वाली उज्ज्वल साड़ी मे बहुत ही सौम्य गरिमा से युक्त आभा लिये शांत बैठी थी। और बीच बीच में अपनी घड़ी देख लेती थी। और माल्यार्पण खतम होने का नाम ही नही ले रहा था। कुछ समय बाद महादेवी जी ने बगल वाले के कान मे कुछ कहा । और वह संचालक के कान मे कहा ।तब संचालक महोदय ने बोला कि मुख्य अतिथि जी को देर हो रही है अतः माल्यार्पण के कार्यक्रम को यहीं समाप्त करके आगे का काम शुरु किया जा रहा है । फिर वक्ताओं का बोलना शूरु हुआ। सब अपने अपने तरीके से महादेवी और मालवीय के रिश्ते का कसीदा काढ़ रहे थे। लफ्फाजी और शब्दों की दलाली शूरु हुई तो खतम ही नही हो रही थी। सबने लगभग एक बात को घुमा फिरा कर कहा कि महामना की आत्मा यहाँ हर समय घूमती रहती है। बहुतों ने तो उसे विभिन्न स्थानो पर देखने और बात करने का दावा भी किया। महादेवीजी.लगता था कि झूठ को पचा नही पा रही थी सो एक बार फिर कान मे कहा और तब जाकर महामना बंदन रूका। और महादेवी जी बोलने को खड़ा हुई। सबसे पहले उन्होंने अपने चारों तरफ गरदन घुमा घुमाकर देखा। फिर बोलीं कि हमारे पहले जितने भी वक्ता आये लगभग सबों ने कहा कि " तथाकथित महामना " की आत्मा यहां हर तरफ घूमती रहती है, लेकिन हमे तो कहीं नहीं दिखाई दे रही है । इतना सुनते ही हाल मे हाल मे चारों तरफ फुसफुसाहट और कानाफूसी शुरु हो गयी। हम आगे बैठे थे अतः पिछे ध्यान नही दिये। महादेवी जी ने कहा कि मै कहना भी चाह रही हूँ कह नही पा रही हूँ । लेकिन फिर आने का मौका मिलेगा कि नही।इसलिये कह.देना चाहती हूँ कुछ लोगों को शायद मेरी बात अच्छी नही लगेगी और कहना शुरु किया...मै जो भी हूँ आपके सामने हूँ और आपने हमे बुलाया है । मेरी भी बहुत ईच्छा थी यहाँ पढंने की , आयी थी लेकिन आपके तथाकथित महामना ने मेरा प्रवेश लेने से मना कर दियाथा अतः हमे मन मारकर ईलाहाबाद मे प्रवेश लेना पड़ा। मेरा प्रवेश न लेने का कारण उस समय समझ मे नही आया। मेरी समझ से पहला कारण मै महिला थी? लेकिन बहुत से महिलायें अध्ययन कर रहीं थी उसमे एक सुचेता कृपलानी का नाम कोट किया, फिर ये महिला वाला तर्क अपने आप कट जाता था। दूसरा कारण मै कायस्थ थी, और सबसे अहं कारण था कि मै ब्राहमण नही थी। हाल मे पूरा सन्नाटा और आधे से ज्यादा हाल खाली हो गया था। और बाहर आयोजक सब एक दूसरे पर आरोप लगा रहे थे कि हमने नही बुलाया, फलाने ने बुलाया। कई लोग वेद वाक्य के प्रयोग द्वारा गाली दे रहे थे । और पहली बार तथाकथित महामना पर महादेवी ने चिंतन करने पर विवश किया और बाद मे मैने उनपर शोध किया तो पाया कि महादेवी जी 300% सही थी।
उस समय 1982 के साप्ताहिक दिनमान जिसमें महादेवी जी और राय कृष्ण दास का पत्राचार के बारे में दास जी के पुत्र का पत्र भी छपा था । पुस्तकालय और भारत कला भवन में से यह देखा जा सकता है ।

महादेवी वर्मा के दाखिला नहीं लेने देने के लिए आजाद भारत के राज्य सभा में बाबासाहब अंबेडकर और कुलपति गोविन्द मालवीय के बीच वाद विवाद हुआ था । यह वाद विवाद डाक्टर अम्बेडकर राज्य सभा में जो भारत सरकार से प्रकाशित डाक्टर अम्बेडकर सम्पूर्ण वांङमय में छपी है,मे देखा जा सकता है।
तथाकथित महामना चतुर , कुटिल जातिवादी , मृदुभाषी ,कट्टर सनातनी और अंग्रेजों और राजाओं के बीच मे लाइजनिंग करने वाले तथाकथित महामना और माइल्ड फासिस्ट तथाकथित देशभक्त थे , जिनको पता चल गया था कि अंग्रेजों के जाने के दिन पूरे होने वाले है। प्रधान मंत्री तो कोई बन सकता है लेकिन देश चलाने के लिये लोग कहाँ से आयेंगे। और हिंदू वि. वि. की कल्पना जिसमे सिर्फ सनातनियों का कब्जा हो । और हिंदू वि.वि. की नींव डाली। गोलवलकर इसी वि. वि. के तथाकथित अध्यापक थे और हेडगवार तथाकथित महामना के 1929 मे जब मालवीय भवन मे गेस्ट बनकर आये थे ,तब गोलवलकर को मालवीय ने हेडगवार को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिये सौंपा था। पं. नेहरू इस बात को जानते थे। और कभी भी अपने रहते भारत रत्न नही दिया।और कांग्रेस ने भी नही दिया। सबसे पहले एनी बेसेंट का हिंदी स्कूल बुद्धि पूर्वक छल से लिया , क्यूँकि अंग्रेज वि.वि. की मान्यता नही दे रहे थे क्यूँकि इनको कोई कोई स्कूल चलाने का अनुभव नही था, महादेवी को जब इनके चिंता का पता चला तो अपना हिंदू स्कूल इनको दे.दिया।और आपको पता होगा कि इस वि.वि के निर्माण मे किसी ब्राह्मण का एक पैसा भी नही लगा है और इस वि.वि. का पूरा उपयोग सनातन धर्म और पोंगा ब्राह्मणों को मजबूत करने के.लिये हुआ और आज भी हो रहा है। पंडित नेहरु ने इसी वि. वि. मे मालवीय की अध्यक्षता मे अपने भाषण मे इसे फासिज्म का सेंटर बताया था. पूरा बनारस का मिडिया और तथाकथित सनातनी पोंगा पंडितों ने पं. नेहरु पर अपना बयान बदलने को जोर और दबाब बनाया ,लेकिन पं. नेहरू ने कहा कि मै अपनी बात वापस नही ले सकता , मै वर्षो जेल मे था और अपने अध्ययन के आधार पर कहा। समय और इतिहास इसका आकलन करेगा।
मेरा एक प्रश्न है , सचिंन तेंदुलकर जैसै गुल्ली डंडा खेलने वाले, शहनाई बजाने वाले को कांग्रेस ने भारत रत्न दे दिया , मालवीय को, जो कांग्रेस के चार बार अध्यक्ष रहे थे, गांधी से 8 साल और नेहरु से 28 साल बड़े थे , को क्यूँ नही इस लायक समझा? और मोदी की सरकार ने भारत रत्न.दिया ,जबकि मालवीय का संघ, से कभी रिश्ता नही रहा। हाँ हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे थे। महादेवी वर्मा और पं.नेहरु का मालवीय के प्रति लगभग एक ही सोच रही। और वह यह थी कि तथाकथित महामना एक जातिवादी ,सनातनी कट्टर ,फासिस्ट ब्राह्मण थे। लंदन मे जब द्वितीय राउंड टेबुल कांफरेंस मे गये थे तो मटकों मे पानी भरकर यहाँ से ले गये थे। आज भी तथाकथित महामना का तथाकथित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी यानि बाभन हिंदू यूनिवर्सिटी का स्वरुप देखें और स्वयं निर्णय करें।.भक्तों को पींड़ा के लिये खेद है। मैं इसी वि.वि. से four first class ,m.sc., ph.d. किया और scientist रहा हूँ । मेरा अपना शोध और 74 से अनुभव है । आज की ताजा.स्थिति क्या है...

देश मे गरीब सवर्णों को आरक्षण कितना जरूरी है। आइये तथाकथित महामना के बनाये बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी ( BHU यानि बाभन हिंदू यूनिवर्सिटी ) की एक बानगी देखिये।

बेचारे गरीब ब्राह्मण! बहुत ही गरीब, बेचारों को आरक्षण दो, अभी ये हाल बिना आरक्षण के है, एक बानगी बीएचयू की देखिए, कितने गरीब हैं बेचारे ब्राह्मण!
चांसलर- पंडित गिरिधर मालवीय
रेक्टर : प्रो. वी. के .शुक्ला
वाईस चांसलर: लाला राकेश भटनागर
चेयरमैन बीओजी आईआईटी: पंडित गिरीश चन्द्र त्रिपाठी
रजिस्ट्रार: डॉ नीरज त्रिपाठी
परीक्षा नियंता: डॉ मनोज पांडेय
उप परीक्षा नियंता: प्रो एसके उपाध्याय
सलाहकार प्रशासन, वित्त व परीक्षा : डॉ केपी उपाध्याय
सलाहकार परीक्षा: पंडित एमआर पाठक
सलाकार सुरक्षा: एके सेठ ( डॉ केपी उपाध्याय के सगे समधी)
चेयर प्रोफेसर (अम्बेडकर चेयर) : प्रो मंजित चतुर्वेदी
चेयर प्रोफेसर (दीन दयाल उपाध्याय चेयर): डॉ श्याम कार्तिक मिश्रा
समन्वयक भोजपुरी अध्ययन केंद्र: प्रो श्रीप्रकाश शुक्ला
समन्यवयक मालवीय पीस सेंटर: प्रो प्रियंकर उपाध्याय
चेयरमैन एम्स सलाहकार समिति: डॉ ओपी उपाध्याय
महामना टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट: प्रो एके त्रिपाठी
डायरेक्टर वेद विज्ञान केंद्र: डॉ उपेंद्र त्रिपाठी
डायरेक्टर मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र: प्रो आशाराम त्रिपाठी
डायरेक्टर आईएमएस: प्रो. एस. एस. पांडेय
डीन आयुर्वेद फैकल्टी: प्रो यामिनीभूषण त्रिपाठी
डायरेक्टर मैनेजमेंट स्टडीज: प्रो सुजीत कुमार दुबे
डायरेक्टर इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस: प्रो अनिल कुमार त्रिपाठी
डायरेक्टर भारत अध्ययन केंद्र: प्रो सदाशिव द्विवेदी
डीन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस: प्रो मल्लिकार्जुन जोशी
डीन आर्ट्स फैकल्टी : प्रो यूसी दुबे
डीन मैनेजमेंट स्टडीज: प्रो पीएस त्रिपाठी
डीन सोशल साइंसेज: प्रो राम प्रवेश पाठक
डीन एजुकेशन फैकल्टी: प्रो आरपी शुक्ला
डीन संस्कृत विद्या धर्म संकाय: प्रो चन्द्रमा पांडेय
डीन लॉ फैकल्टी: डॉ आरपी राय
डीन कॉमर्स फैकल्टी: प्रो सीपी मल्ल
प्रिंसिपल महिला महाविद्यालय: प्रो चंद्रकला त्रिपाठी
चेयरमैन स्कूल बोर्ड: प्रो रमा शंकर दुबे
विधि अधिकारी : अभय पांडेय
प्लेसमेंट ऑफिसर: नित्यानंद तिवारी
चीफ वार्डेन गेस्ट हाउस: प्रो राकेश पांडेय
भारत अध्ययन केंद्र में नियुक्त चेयर प्रोफेसर्स:
1. प्रो कमलेश दत्त त्रिपाठी
2. प्रो युगल किशोर मिश्रा
3. प्रो राकेश उपाध्याय
4. श्रीमती मालिनी अवस्थी
भारत अध्ययन केंद्र में शताब्दी विजिटिंग फेलो:
1. डॉ मंजू द्विवेदी
2. डॉ मलय कुमार झा
3. डॉ अमित कुमार पांडेय
4. अर्चना दीक्षित
5. अनुपपति तिवारी
6. गीता योगेश भट्ट
7. पल्लवी त्रिवेदी
8. मालविका तिवारी
9. डॉ ज्ञानेंद्र नारायण राय
अनंत .........
इस घटना के बाद मैनें तथाकथित महामना का इतिहास खंगालना शुरू किया तो पता चला कि जैसे डा. राधा कृष्नन ने दूसरे कि किताब को नकल करके अपने नाम छाप कर विद्वान बन गये थे उसी प्रकार तथाकथित महामना ने चिटिंग करके एनी. बेसेंट और दरभंगा नरेश के नाम को मिटाकर स्वयं BHU का संस्थापक बन गये । दस्तावेज तो यही बताते हैं ।

मालवीय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मुख्य संस्थापक नहीं थे, शोधकर्ता का दावा है

दरभंगा के महाराजा और ब्रिटिश थियोसोफिस्ट एनी बेसेंट की भूमिका महत्वपूर्ण थी, जो संस्था के आगामी इतिहास के लेखक हैं...

मदन मोहन मालवीय, जिनके लिए पिछले दिनों भारत रत्न पुरस्कार की घोषणा की गई थी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का एकमात्र केंद्रीय आंकड़ा नहीं था। यह दावा स्वतंत्र शोधकर्ता तेजकर झा ने किया है, जो बीएचयू के इतिहास पर एक किताब को अंतिम रूप दे रहे हैं।
ब्रिटिश ट्रैवलर्स एंड पेंटर्स: 1780-1850 और डॉ. राजेंद्र प्रसाद की चित्रात्मक जीवनी में बिहार के लेखक झा ने स्क्रॉल.इन के साथ अपने नवीनतम शोध पर चर्चा की ।
प्रश्न....
१..आपने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पर अपना शोध क्यों शुरू किया?

मैंने 2012 में बीएचयू का दौरा किया और देखा कि हर कमरे में मदन मोहन मालवीय की तस्वीर थी, जिसके साथ कैप्शन लिखा था, "बीएचयू के संस्थापक"। प्रश्न यह उठता है कि यह सुझाव देने के लिए क्या प्रमाण है? हम 20 वीं शताब्दी में बनाई गई एक संस्था के बारे में बात कर रहे हैं, प्राचीन काल या मध्यकाल में नहीं। BHU में, 1905 से 1916 तक की अवधि के दस्तावेज गायब थे। इसलिए, मैंने इस मामले को फिर से संगठित करने और BHU की स्थापना के संबंध में पूरी सच्चाई सामने लाने का सोचा।

२.. क्या मदन मोहन मालवीय बीएचयू के संस्थापक नहीं थे?

नहीं, मदन मोहन मालवीय उस आंदोलन में सबसे फ्रिंज खिलाड़ी थे, जिसने बीएचयू की नींव रखी। उनके पास न तो कोई विश्वविद्यालय स्थापित करने का साधन था, न ही सरकार से अनुमोदन प्राप्त करने का कोई ताली था। वह जमींदारों और शासक प्रमुखों को विचार बेचने की स्थिति में भी नहीं था। इन कारणों के कारण, वह 1904 (जब वह कहते हैं कि उसने इस विचार की कल्पना की और एक प्रोस्पेक्टस निकाला) से 1911 तक कुछ भी हासिल नहीं कर सका (जब उन्होंने [ब्रिटिश थियोसोफिस्ट और होम रूल लीग के संस्थापक] एनी बेसेंट और महाराजा दरभंगा से हाथ मिलाया) । इसके बाद, जब हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए सोसाइटी का गठन किया गया, तो मालवीय सिर्फ एक साधारण सदस्य थे।

दूसरी ओर, दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह ने सोसाइटी फॉर हिंदू यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया, सरकार के साथ इसी आंदोलन का नेतृत्व किया और धन संग्रह के लिए देश का दौरा किया। ( 27 जून, 1913 को लंदन टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट )।

जब हमने समकालीन दस्तावेजों का अध्ययन किया तो उसके अनुसार, यह मालवीय नहीं बल्कि दरभंगा के महाराजा थे जो बीएचयू के वास्तविक संस्थापक थे?
किसी एक व्यक्ति द्वारा किसी संस्थान की स्थापना नहीं की जा सकती। 1910-1920 का युग पूरी तरह से औपनिवेशिक सत्ता पर हावी था। गांधी का उदय नहीं हुआ था और कांग्रेस सिर्फ एक छोटी पार्टी थी और सरकार के विरोध में थी जिसे संस्थान को मंजूरी देनी थी। फिर से, भारत अभी भी औद्योगिक रूप से विकसित नहीं था, इसलिए आवश्यक धन केवल सरकार , जमींदारों और शासक प्रमुखों से ही आ सकता था। तो वह व्यक्ति कौन था जो ज़मींदार / सत्तारूढ़ प्रमुखों और तत्कालीन सरकार दोनों के लिए समान पहुंच में हो सकता था ? जाहिर है मालवीय एक अकेले नहीं हो सकते थे।

मैं यह नहीं कहता कि मालवीय को श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए, लेकिन वह निश्चित रूप से मुख्य खिलाड़ी नहीं थे। एनी बेसेंट ने विश्वविद्यालय के लिए अपना केंद्रीय हिंदू कॉलेज दिया और दरभंगा के महाराजा सर रामेश्वर सिंह ने बीएचयू की स्थापना के परिणामस्वरूप आंदोलन का नेतृत्व किया, सोसाइटी फॉर हिंदू यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष के रूप में। उन्होंने सरकार के साथ बातचीत की और कई बार सभी से जाकर जमींदारों और सत्तारूढ़ प्रमुखों से धन प्राप्त किया। उन्होंने खुद 5 लाख रुपये दान किए। यही कारण है कि सब जगह उनका हस्ताक्षर है जो उस अवधि के सबसे महत्वपूर्ण पत्राचार पर पाया जाता है और यह उनका नाम है जो समकालीन मीडिया रिपोर्टों में बीएचयू के आंदोलन के पीछे मुख्य व्यक्ति के रूप में दिखाई दिया।

4 फरवरी, 1916 को फाउंडेशन स्टोन बिछाने समारोह में भी, दरभंगा के महाराजा ने बीएचयू के लिए सोसायटी की ओर से अपने अध्यक्ष के रूप में भाषण दिया और वायसराय ने इसका उत्तर दिया। किसी अन्य व्यक्ति ने उस दिन कोई भाषण नहीं दिया। इसके अलावा, यह वही शक्स थे , जिन्हं सर हरकोर्ट बटलर (सदस्य, गवर्नर जनरल काउंसिल , शिक्षा) सहित सभी से बधाई का तार मिला।

३.. इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आपने किन स्रोतों से सलाह ली और इन दस्तावेजों का क्या कहना है?
मैंने सरकारी पत्राचार, भाषणों, सोसायटी की रिपोर्ट, दौरे की रिपोर्ट, सत्तारूढ़ प्रमुखों के पत्र और सामान्य लोगों के पत्र, समाचार पत्रों की रिपोर्ट (मूल प्रतियां) से १८० पेज और ब्रिटिश अभिलेखागार से रखे बटलर संग्रह के समान दस्तावेजों के लगभग १३८ पेज को एकत्र किए। ये दस्तावेज़ या तो दरभंगा के महाराजा को निर्देशित किए जाते हैं या उनकी तालिका से उत्पन्न होते हैं। द लंदन टाइम्स रिपोर्ट में केवल महाराजा दरभंगा और सर हरकोर्ट बटलर को संदर्भित किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि दरभंगा के महाराजा ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मार्च 1915 में बीएचयू की स्थापना के लिए विधेयक प्रस्तुत करते समय, सर हरकोर्ट बटलर कहते हैं, “इससे पहले कि मैं आगे बढ़ूँ, मुझे समिति और विशेष रूप से दरभंगा के महाराजा बहादुर, श्रीमती बेसेंट, डॉ. पं. सुंदरलाल को बधाई देना चाहिए। मदन मोहन मालवीय, राय बहादुर गंगा प्रसाद वर्मा, सर गूरू दास बनर्जी, डॉ. रास बिहारी घोष, और समिति के बाहर बीकानेर के महाराजा और बनारस के महाराजा के रूप में ऐसे सक्रिय मददगार हैं, जिन्होंने सफलता हासिल करने मे मदद की है।

इसी तरह, कलकत्ता से एक प्रमुख पत्रिका - द हिंदू पैट्रियट(११ जनवरी, १ ९ १५) - लिखते हैं, "दरभंगा के महाराजा बहादुर में, प्रवर्तकों ने एक शानदार नेता पाया है, जिनके उत्साह से उनके प्रभाव की बराबरी की जाती है और हिंदू विश्वविद्यालय के भावी इतिहासकार उन अत्यधिक सफल यात्राओं पर ध्यान देना पसंद करेंगे। देश के एक छोर से दूसरे छोर तक महाराजा बहादुर, जिसने आंदोलन के सभी सफल चरणों में अपने फंड के लिए इतनी पर्याप्त पहुंच बनाई थी। ”अन्य दस्तावेजों में भी महाराजा को इस आंदोलन के नेता के रूप में जाना जाता है।

४..यह मालवीय को कहाँ छोड़ता है? क्या मालवीय ने सोसायटी में काम करने का मानदेय लिया था?
मालवीय समाज के सदस्य थे। लेकिन सोसायटी के नियम के विपरीत में , ( बीएचयू के लिए एसोसिएशन ऑफ सोसाइटी के ज्ञापन में से रूल संख्या 5 के विपरित ), उन्होंने सोसायटी के लिए काम करने के लिए मानदेय लिया। फिर उन्होंने यह राशि विश्वविद्यालय कोष को दान कर दी। मालवीय ने कई लोगों के साथ जमीनी स्तर के समन्वय पर काम किया। इसलिए वह भी संस्थापक का दर्जा पाने का हकदार है लेकिन मुख्य संस्थापक के रूप में नहीं। बीएचयू का पहला इतिहास उनके कार्यकाल के दौरान कुलपति के रूप में 1936 में एक सीनेट सदस्य श्री सुंदरम द्वारा लिखा गया था। यह पुस्तक, ( BHU 1905 से 1935,) जिसमे 1911 से 1916 तक की स्थापना के काम की कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं देता है। 1911 से 1916 तक का दस्तावेज गायब हो गया , किसने गायब किया , यह जांच का बिषय है , लेकिन कौन जांच करेगा? कोई भी दस्तावेज़ अक्टूबर 1911 से दोनों को नहीं बचाता है (दरभंगा के महाराजा से बटलर के पत्र और उत्तर) पुस्तक में उल्लेख किया गया है। दरभंगा और एनी बेसेंट के महाराजा की भूमिका बंगाल, बिहार, यूपी के जमींदारों की भी है।

५.. आपने कहा कि बीएचयू की स्थापना के लिए गठित सोसायटी के लिए काम करने के लिए मालवीय को मानदेय मिला। उसे नियम का उल्लंघन करने पर क्यों दिया गया?
यह दिखाने का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि उन्हें नियम संख्या ५ के उल्लंघन में मानदेय क्यों दिया गया। वासुंदरम द्वारा पुस्तक के पृष्ठ 81 पर स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि मालवीय को सोसाइटी के लिए अपने काम के लिए मानदेय मिला और बाद मे उसे विश्वविद्यालय कोष में दान कर दिया। मालवीय ने काम करने का मानदेय लिया फिर बाद में दान के नाम पर उस रूपये को लौटा दिया , इसका क्या मतलब?

६.. ये कैसे हुआ?
चूंकि बीएचयू के इतिहास पर पहली पुस्तक मालवीयजी द्वारा कमीशन की गई थी, इसलिए विश्वविद्यालय के पहले कुलपति सर सुंदर लाल थे जो सोसायटी के सचिव भी थे , जिनका मृत्यु 1917 में हो गयी तब मदन मोहन मालवीय कुलपति के रूप में ज्वाईन किया और कुलपति मदन मोहन मालवीय द्वारा 1905 से 1919 तक दस्तावेजों को नहीं रखा गया और मालवीयजी को "संस्थापक" घोषित किया गया, मुझे लगता है, यह जानबूझकर मालवीयजी पर निहित है। तथ्यों को छिपा रहा है। दरभंगा के महाराजा सर रामेश्वर सिंह की 1929 में मृत्यु हो गई, सर सुंदर लाल (BHU की स्थापना के लिए गठित सोसायटी के सचिव) की 1917 में मृत्यु हो गई, और इस पुस्तक के चालू होने तक अधिकांश अन्य लोगों का भी निधन हो गया। मालवीय जो अकेले जिंदा थे और सत्ता में थे, अब दस्तावेजों की चयनात्मक पसंद तय करने मे स्वतंत्र थे ।
आज भी बहुत से दस्तावेज गायब है , जिसकी जमीन ली गयी उसके परिवार को नौकरी देने की डीड भी गायब कर दी गयी। जमीन काशी नरेश ने दिया , अब कहा जाता है कि काशी नरेश को मालवीय ने पैसा दिया था , इससे बड़ा झूठी बात क्या हो सकती है।

७.. बीएचयू की स्थापना में मालवीय की क्या भूमिका थी?
एनी बेसेंट और रामेश्वर सिंह की तरह मालवीयजी ने भी हिंदुओं के लिए एक विश्वविद्यालय की कल्पना की थी। उन्होंने इस योजना को लोकप्रिय बनाने के लिए जनता के बीच काम किया। उन्होंने कुछ अवसरों पर दरभंगा के महाराजा के साथ दौरा भी किया। दस्तावेज़ इससे ज्यादा कुछ और नहीं सुझाते हैं जो मालवीयजी ने किया था।

एनी बेसेंट को अक्सर भुला दिया जाता है, क्योंकि वह उस कॉलेज की स्थापना की थी जिसे बाद में BHU के रूप में विकसित किया गया था। इस पूरे आंदोलन में उनकी क्या भूमिका थी?
एनी बेसेंट के पास एक कॉलेज (सेंट्रल हिंदू कॉलेज) था जिसे वह एक विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करना चाहती थी। उसने अपने विश्वविद्यालय का नाम द इंडिया यूनिवर्सिटी रखा था। बाद में उसने मालवीय और महाराजा के साथ हाथ मिलाने का फैसला किया क्योंकि वह निजी आवासीय विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए धन (१.५ करोड़ रुपये) प्राप्त करने में सक्षम नहीं था।
दस्तावेज बताते हैं कि पं. मदन मोहन मालवीय की इच्छा एक हिंदू वि.वि. बनाने की। यह इच्छा कैसे पैदा हुई? कहते हैं कि मालवीय बहुत एक चतुर , दूरदर्शी, कट्टर सनातनी , मनुवादी ब्राह्मण थे। १९०३-४ में मालवीय के मन मे वि. वि. नही, हिंदू वि.वि. बनाने का बिचार आया । लेकिन न जमीन , न रूपया और फिर प्रथम विश्व यद्ध के संभावना। बिचार को स्थगित करना पड़ा। १९११ में एनी. बेसेमट " दि इंडिया यूनिवर्सिटी " बनाने को तैयार थी और सेंट्रल हिंदू स्कूल नामक संस्था चला रही थी। एनी .बेसेंट भी हिंदू धर्म से प्रभावित थी। उसी समय दरभंगा नरेश भी वि. वि. खोलने के लिये तैयार थे। मालवीय ने वि.वि. खोलने की अर्जी सरकार के पास लगायी और उनकी अर्जी को सरकार ने यह कहकर रिजेक्ट कर दिया कि आपके पास कोई स्कूल, कालेज चलाने का कोई अनुभव नहीं है, सीधे वि. वि. खोल नही सकते। बड़े दुखित मन से एनी बेसेंट से मिलने गये , बेसेट ने पूछा मालवीय जी क्या बात है आप बहुत दुखी लगते हो। मालवीय ने अपना दुखड़ा बताया और वह उदारमना महिला ने कहा कि मेरा स्कूल ले लो और फिर से अप्लाई करो। मालवीय ने दरभंगा नरेश से मिलकर एक हिंदू वि.वि. बनाने के लिये सोसायटी का गठन किया , दरभंगा नरेश उसके प्रेसिडेंट और सर सुंदर लाल सचिव बने, मालवीय एक साधारण सदस्य। दरभंगा नरेश ने तुरंत ५ लाख दान भी दिया, ५ लाख उस समय का आज के ५०० करोड़ के बराबर होगा। दरभंगा नरेश ने मालवीय के कहने पर बहुत लोगों से चंदा भी दिलाया। परमिशन मिल जाने के बाद जमीन की बात आयी तो मालवीय ने काशी नरेश को अपने जाल में फंसाकर वर्तमान वि. वि. की जमीन को तिगड़म से लिया।
काशी नरेश को कोई पुत्र नहीं था, बहुत उदार हृदय के आदमी थे। मालवीय अक्सर रामनगर किले में जाने लगे और एक दिन अवसर देख कर काशी नरेश से बोले राजन मैॆ आपका दर्द समझता हूं , अगर आप थोड़ी मदद करे तो रोज १० हजार पुत्र किले के सामने खड़े होकर गंगा जल से किले की तरफ अर्घ्य देंगें। और उसी समय किले के अंदर से ही गंगा मे सीढ़ी जो थी, उससे जाकर अंजुली मे गंगा जल लेकर आये और काशी नरेश से संकल्प करा लिया। राजा ने कहा कि एक दिन मे जितनी पैदल चलकर जमीन घेर लोगे वह तुम्हारे वि.वि. की होगी। दूसरे दिन से एक आदमी के सिर पर चूना रखकर आगे आगे मालवीय चलने लगे और पिछे से चूना का निशान लगने लगा। फिर क्या लोग विरोध करने लगे , जो विरोध करता और कहता
कि ये मेरा है तो मालवीय रास्ता बदल देते , इसका परिणाम आप आज भी देख सकते हैं कि वि.वि. की चहारदिवारी कहीं भी सीधी नहीं है। आते आते सिर गांव मे रिद्धि, सिद्धि नामके दो भूमिहार किसानो ने रोक दिया और परिणाम लड़ाई मे बचऊ यादव मारे गये , रिद्धि ,सिद्धि को मालवीय के प्रयास से फांसी हो गयी। मरते वक्त मालवीय के नाक में कीड़े पड़ गये थे तो मालवीय कहते थे कि ये रिद्धि, सिद्धि हैं। १९१७ मे सर सुंदरलाल और १९२९ मे दरभंगा नरेश के मरने के बाद मालवीय का वि. वि. पर पूरी तरह से कब्जा हो गया । जब मैं १९७५ मे यहां पढ़मे आया था मालवीय के प्रति बहुत श्रद्धा थी लेकिन वि. वि. के चरित्र को देखकर हमे यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि गैर ब्राह्मणों के पैसे से बनी यह संस्था पूरी तरह से एक खास किस्म के जाति के कब्जे में हैं , इस वि.वि. के निर्माण मे भीख मांगने वालों से लेकर संकट मोचन के कोढ़ियों ने भी दान दिया है लेकिन किसी ब्राह्मण ने एक रूपया भी नही दिया है। यहां कांग्रेस सरकार मे आचार्य नरेंद्र को छोड़कर सभी कुलपति ब्राह्मण ही रहें, जब गैर कांग्रेसी सरकारें आयी तो गैर ब्राह्मण कुलपति आये । जब मै पढ़ने आया था तो १२०० टीचरों मेम ९०० टीचर अकेले ब्राह्मण ही थे। गैर ब्राह्मण जो थे इनकी कृपा के मोहताज थे। दलित २२.५% रिजर्वेशन के वावजूद भी मात्र ३ थे, उसमे भी कोई प्रोफेसर नहीं था। राधाकृष्नन जब कुलपति हुये तो साऊथ के ब्राह्मणों को भर दिया। आज भी यह वि.वि. ब्राह्मणों का चारागाह है जो जनता के पैसे पर इनका कब्जा है। यहां दादा के नोट्स से पोता पढ़ाता है । इस वि.वि. का नाम बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से बदल कर ब्राह्मण हिंदू यूनिवर्सिटी कर देना चाहिये।