झारखंड चुनाव में नक्सलियो को निमन्त्रण किसने दिया
| 29 Nov 2019

चुनाव आयोग ने झारखंड में विधान सभा चुनाव की घोषणा करते हुए पांच चरणों में चुनाव कराये जाने की बातें कहीं थी। हालांकि कई राजनीतिक दल चाहते थे कि चुनाव एक दो चरण में कराये जाने चाहिए। तब चुनाव आयोग ने पहली बार स्वीकारा था कि राज्य में नक्सली गतिविधियां जारी हैं इसलिए पांच चरणों में ही चुनाव कराये जायेंगे। तब यहां के बुद्धिजीवियों को विश्वास नहीं हुआ था कि राज्य में नक्सलियों की धमक अभी भी यहां कायम है। इसकी मुख्य वजह यह थी कि एक लंबे अर्से से यहां नक्सली गतिविधियां बंद थी। हालांकि राज्य की भाजपानीत वाली रघुवर सरकार भी यह कह रही थी कि यहां नक्सलियों का पूर्णतः सफाया हो चुका है। लेकिन मतदान से पूर्व लातेहार जिले में

नक्सलियों के द्वारा दारोगा समेत चार जवानों को मौत के घाट उतार दिये जाने के बाद चुनाव आयोग की आशंका को बल मिला। इसके अलावा नक्सलियों ने पलामू में झारखंड मुक्ति मोर्चा के एक नेता की भी हत्या करके सनसनी फेला दी। लातेहार में तो नक्सलियों ने एक भाजपा नेता के वाहन पर भी फायरिंग की। कई जिलों में पोस्टर चिपकाकर नक्सलियों ने वोट बहिष्कार की भी घोषणा की। खूंटी जिले में तीन नक्सली पोस्टर और बैनर के साथ गिरफ्तार भी किये गये। इन सबके बावजूद कहा जा सकता है कि झारखंड में नक्सली अब भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। जबकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी चुनावी रैलियों में बारंबार राज्य की रघुवर सरकार को क्लिनचिट देते हुए कह रहे हैं कि भाजपा सरकार की वजह से ही झारखंड से नक्सलियों का सफाया हो चुका है। लोकसभा चुनाव के वक्त भी राज्य में नक्सलियों ने दहशत फेलाने की पूरी कोशिश की थी। लेकिन वे इसमें बहुत ज्यादा सफल नहीं हुए थे।

लोकसभा चुनाव के ठीक बाद जून के महीने में सरायकेला खरसावां जिले के तिरूडीह में नक्सलियों ने पुलिस के जवानों को घेर कर मौत के घाट उतार दिया था। इस घटना में पांच पुलिस के जवान शहीद हो गये थे। उस वक्त कहा गया था कि सराकेला के सारंडा जंगल में नक्सली गतिविधियां तेज हुई हैं। वहां नक्सली कमांडर महाराज प्रमाणिक के दस्ते ने डेढ़ महीने में कई नक्सली गतिविधियों को अंजाम दिया था। इतना ही नहीं सरायकेला में तो लोकसभा चुनाव के वक्त नक्सलियों ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के चुनावी कार्यालय तक को बम विस्फोट करके उड़ा दिया था। ज्ञातव्य है कि 2014 के बाद राज्य में नक्सली गतिविधियों में कमी आयी है।

इस साल मात्र 14 पुलिसकर्मी नक्सली हमले का शिकार हुए हैं। जबकि 2014 से लेकर 2018 तक नक्सली हमले में शहीद हुए पुलिस जवानों की संख्या 28 रही थी। राज्य गठन के बाद जब भी झारखंड में चुनाव हुए तो नक्सली प्रत्याशियों से लेकर मतदाताओं तक को डराने-धमकाने का कार्य किया करते थे। यहां तक किवे मतदान करने वालों का हाथ तक काट दिया करते थे। प्रत्याशियो के प्रचार वाहन पर हमला करना तो आम बात थी। लेकिन इस के बाद के विधानसभा चुनाव में ऐसी किसी भी गतिविधियों की सूचना नहीं आयी है। इससे जाहिर होता है कि
राज्य के चुनाव में नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ है। पुलिस प्रशासन की सक्रियता की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। पूर्व में कई नक्सल र्प्रभावित इलाकों के थानों के दरवाजे दिन ढलते ही बंद हो जाया करते थे। अगर रात के वक्त में थाना क्षेत्र में कोई नक्सली गतिविधियों की सूचना आती थी तो पुलिसकर्मी वहां जाने से डरते थे और दिन होने का इंतजार किया करते थे। लेकिन वर्तमान में परिस्थितियां बदली हैं और किसी भी इलाके में नक्सली गतिविधियों की सूचना मिलने पर पुलिस के जवान तत्काल वहां पहुंच रहे हैं और नक्सलियों से मोर्चा भी ले रहे हैं। अभी तो राज्य में मतदान होना बाकी है। देखना यह है कि मतदान के वक्त राज्य में नक्सलियों की क्या गतिविधियां रहती हैं। मतदानकर्मियों को भी सुरक्षित मतदान केंद्रों तक पहुचाया जा रहा है। अगर वे षांतिपूर्ण मतदान
कराकर वापस आ जाते हैं तो कहा जायेगा कि राज्य में नक्सली गतिविधियां चुनाव से मुक्त हुई है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि मतदान कराने के बाद वापस लौट रही पोलिंग पार्टियों पर भी नक्सली हमला करने से नहीं चूकते रहे हैं।

नवेन्दु उन्मेष
सीनियर पत्रकार