भ्रष्टाचार और अंधविश्वास की प्रतीक गंगा मैया और उसकी सफैया
| 01 Feb 2020

. अपने असली माई या औरत के रूप में, किसी मां की किसी को चिंता नहीं है, लेकिन गंगा माई, काली माई, दुर्गा माई, जिवितिया माई, संतोषी माता, गाय माता आदि सैकड़ों माई सिर्फ भारत में केवल हिन्दू धर्म में ही पाई जाती हैं, जिनके न खानदान का, न ही इनके मां बाप का ठिकाना है। मालूम नहीं कब से, कहां से और कैसे, किस स्वार्थी ने दुकान चलाने के लिए अस्तित्व में लाकर पुजवाना शुरू कर दिया।

यहां हम एक माई, गंगा माई, जिनकी जन-मानस में, कुम्भ मेला स्नान करके पाप से मुक्ति पाने की आस्था बनी हुई है। विवरण देना उचित समझता हूं।

पौराणिक कहावत है कि गंगा, शंकर की जटा से निकली है और भागीरथ ने उसे पृथ्वी पर लाया है, इसलिए पवित्र है। यह विचित्र मूर्खता की आस्था की कहानी गढ़ी गई है, ठीक है, मान लिया गंगा को भागीरथ ने पैदा किया तो भारत की तथा विश्व की इससे भी बड़ी और लाखों नदियों को कौन पैदा किया? क्या कोई अंधभक्त यह दावा कर सकता है कि, मुझे भगवान ने पैदा किया और हमारे दूसरे भाइयों को हमारे बाप ने पैदा किया है।

इतना भी मूर्ख नहीं समझते कि, विश्व की सभी नदियां प्रकृति के द्वारा पहाड़ों पर या ऊंचाई पर वारिस होने से, पानी अपने गुणों के कारण नीचे धरातल पर बहते हुए या तो किसी बड़ी नदी में या खाड़ी में या समुद्र में समाहित हो जाती है, इसलिए नदियां बनती हैं।

वैज्ञानिकों ने यह भी सत्य साबित कर दिया है कि प्राणी जाति की उत्पत्ति से पहले समुद्र, नदी, झील पहाड़ आदि अस्तित्व में थे, यह भी सत्य है कि भागीरथ का बाप भी गंगा नदी में डुबकी लगाता था।

धूर्तबाजो के खणयंत्र को समझना भी जरूरी है। इस गंगा माई को गंगोत्री से गंगासागर तक हजारों दुकानों के रूप में पवित्र स्थल बताकर हर साल पंडे पुजारी, लाखों-करोडो रुपये दान-दक्षिणा के रूप में भोले-भाले जन-मानस से लूट लेते हैं। मनुवादी पंडित तुलसी ने गंगा को अंधविश्वासी मान्यता कैसे दिलाई? जरा इन दोहों पर ध्यान दीजिए!
तब गणपति शिव सुमति, प्रभुनाईही सुरसमिहि माथ!

राम घाट कहं किन्ह प्रणामा!!
रामचन्द्र जी, गणेश जी और शिवजी का नाम जपकर, सिर नवाकर, गंगा घाट प्रणाम कर आगे बढ़ते हैं।
भरत कूप अब कहहि लोगा!
अति पावन तीरथ जल जोगा!!
जो रामेश्वर दरसनु करहहि:!
ते तन तजि मम लोक सिधरहि!
जो गंगाजल आनि चढ़ावाइहि:!
सो सायुज्य मुक्ति नर पाइहि:!!

इसी गंगा माई में बरसात के दिनों में कोई हाथ पैर भी नहीं धोना चाहता है, इसलिए बरसात के दिनों में कोई पवित्र स्नान भी नहीं होता है, कितनी धूर्तता पूर्ण चालाकी हैं?
हर साल सैंकड़ों लोगों का बाढ़ के रुप में मौत के घाट उतार देती है, हजारों-करोडो की सम्पत्ति बर्बाद कर देती है। हजारों जानवरों को बहा ले जाती है, क्या इसी को मां कहते हैं, जो अपने ही औलाद को हजम कर जाय,? फिर भी अपनी असली माई से ज्यादा गंगा माई पूज्यनीय बनी हुई है। इसी को कहते हैं, अंधश्रद्धा या अंधभक्ति!
पाप धोने का बहाना बताकर एक वर्ग अपनी रोजी रोटी का साधन बना लिया है। इतना भी मूर्खों को नहीं मालूम कि इन्सान का मन गंदा होता है, तन नहीं और मन स्नान करने से साफ नहीं हो सकता। यह भी आश्चर्य है कि यही महान गंगा, एक अछूत को, जिन्दगी भर स्नान करने पर भी पवित्र नहीं कर पाती है, लेकिन खुद गंदी हो जाती है। अब तो भारत सरकार भी कयी सालो से साफ कर रही है, फिर भी गंदी और अपवित्र ही बनी रहती है।

गंगा मैया की सफैया
अंधभक्तों का यही तर्क रहता है कि गंगा का पानी शुद्ध और अनवरत गर्मी के दिनों में भी सूखती नहीं है। गंगा नदी बरसात के दिनों में, वर्षा से और गर्मी के दिनों में हिमालय की बर्फ पिघलने से बहती रहती है। नेचुरल बर्फ से पिघला पानी कुछ हद तक शुद्ध रहता ही है, बाद में गंदा होना शुरू हो जाता है।

यह भी सत्य है कि आठ महीने की जो भी गंदगी शहरों के गन्दे नालों से, छोटी मोटी नदियों के मिलने से, पूजा पाठ की सामग्री जैसे आदि कचरों से गंदी होती रहती है, वह नेचुरली बरसात के दिनों में, आज-कल ही नहीं हजारों साल से, बाढ़ के पानी से साफ होती चली आ रही है।

सफैया के नाम पर करोड़ों का वजट पास होता है, स्टिमेट बनता है, टेंडर निकाला जाता है, ठेकेदार तय करने में बहुत ही माथा-पच्ची करनी पड़ती है। माफिया, गली के गुंडे, विधायक, सांसद, अधिकारी सभी अपनी अपनी हिस्सेदारी की दावेदारी ठोकने लगते हैं। जो इन सभी को चाहे हुक या टुक से पटाने की हैसियत रखता है उसे ठेका मिल जाता है।अब उसे काम करने की परमिट जारी हो जाती है। इतना करते करते बरसात का समय आ जाता है। ठेकेदार गंगा माई की पूजा पाठ करते हुए चुनरी चढ़ाने की मनौती करता है और बरसात का पानी बाढ़ के रूप में आता है और गंगा खुद ही साफ हो जाती है। अधिकारी सितंबर में ठेकेदार के काम का निरीक्षण कर सत्यापन कर देता हैं और बिल पास हो जाता है। यदि सही हिस्सेदारी देते हुए सभी को ख़ुश कर दिया तो उस अच्छे ठेकेदार का प्रमाणपत्र भी मिल जाता है।

इस तरह हर साल भारत सरकार की तिजोरी के साथ साथ गंगा माई भी साफ हो जाती है और अंधभक्त खुश हो जाते हैं।
हकीकत है,कहावत भी है,सत्य कड़वा होता है।
धन्यवाद!
धीरेन्द्र यादव ( एडवोकेट) इलाहाबाद Advocate Dhirender Yadav , Ganga Cleaning Programme , Ganga Cleaning Project ,