दलित सिर्फ जाति से नहीं ,मन और कर्म से भी नीच होते है
| 05 Feb 2020

जन उदय : ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई वर्ण और जाति वयवस्था जो की दूसरी ईस्वी में बननी शुरू हुई क्योकि इतिहासिक प्रमाणों में २७० ईसवी पूर्व ब्रह्धास्थ के बाद से ब्राह्मण वर्चस्व बढ़ा

इसी के बाद ब्राह्मणों के सारे ग्रन्थ भी लिखे गए क्योकि चन्द्रगुप्त मौर्य के समय जब मेग्स्थ्निज़ भारत आया तो उसने भारतीय समाज के वर्णन अपनी पुस्तक इंडिका में किये और इस पुस्तक में साफ़ साफ़ लिखा है की भारत में जाति वाव्स्था नहीं थी समाज साथ भागो में काम के हिसाब से बता हुआ था और चाणक्य नाम का भी कोई व्यक्ति दरबार में नहीं था .

जाति के कुचक्र में फंसे दलितों को भारतीय सविंधान के जरिये निकाला गया इन्हें समानता का , पढने का , नौकरी का , सम्पति का कानूनी अधिकार मिला , ये बात अलग है की जातिवादी समाज आज भी इन्हें ये अधिकार नहीं देना चाहता और इसके लिए नए नए प्रपंच रचता रहता है .

दलित लोग पढ़ाई लिखाई न करके आरक्षण के भरोसे बैठ जाते है और जब इन्हें आरक्षण से नौकरी मिल जाती है तो ये सीधे दुबारा से उसू समाज के चरणों में , यानी ब्राह्मणवादी जाल में गिर जाते है बाबा साहेब को एक बार भी प्रणाम नहीं करते जिनकी वजह से इनको इंसान होने के कानूनी अधिकार मिले

ये लोग अपनी निजी स्वार्थो के लिए सबसे पहले अपने समाज को ठगते है उदित राज , रामदास अठावले , रामविलास पासवान , और अन्य ऐसे बढे अधिकारी जो आरक्षण का मजा लेने के लिए तो अपना जाति प्रमाणपत्र दिखा देते है लेकिन फायदा होने के बाद फिर अपने ही समाज को प्रताड़ित करते है .

ये लोग अपनी नीचता के चरम स्तर पर तब आते है जब इन्हें कहा जाता है कि मंदिर में नहीं आना , बल्कि कुछ मंदिरों के बाहर तो बोर्ड लगे रहते है कि इस मंदिर में शुद्रो और जानवरों का आना मना है ये लोग तब भी बार बार वही जाते है और यह बात सिर्फ आम आदमी के साथ नहीं है बल्कि देश के राष्ट्रपति तक के साथ हुई है लेकिन ये फिर भी वही जाते है बेशर्मो की तरह .
देश में नागरिकता कानून के जरिये सविंधान को तोड़ दिया गया है और इस कानून के विरोध में पूरी दुनिया में सिर्फ मुस्लिम नहीं बालकी भारतीय समुदाय के काफी लोग विरोध कर रहे है लेकिन खुद दलित नेता भगवा सरकार की गोद में बैठ कर उनके द्वारा दिया गया पद प्रतिष्ठा का मुर्त्र पी रहे है

ये कैसे लोग है बार बार अपमानित होते है लेकिन इनके मूह से आवाज नहीं निकलती मायवती जैसी नेत्री का निर्णय की दलित नागरिकता के कानून पर सडको पर न आये उस समय बिलकुल सही था क्योकि उस वक्त सभी भाजपाई सरकारे नागरिकता कानून का विरोध करने पर लोगो को देशद्रोह के कानून में जेल ठूंस रही थी या गोली मार रही थी , लेकिन क्या मायावती का फर्ज नहीं बनता की एक बार एक विशाल रैली निकाले और देश में लोकतंत्र का परचम फहराए लेकिन मैडम इतिनी बड़ी महारानी है की इन्हें महल से बहार आने की फुर्सत ही नहीं

आज संसद में मंदिर बनाये जा रहे है ,प्रधानमंत्री रोजी रोटी , रोजगार पर कुछ नहीं बोलता कितना बड़ा दुर्भाग्य है इस देश लेकिन दलित ही नहीं सभी जातिओ और धर्म के लोग जो लोकतंत्र में विशवास रखते है या तो आज जेल में ठुंसे जा रहे है या चुपचाप बैठे रो रहे है ... सच में ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है इस देश का वरना आज संसद में दलित सांसदों की संख्या ऐसे कानून को खत्म करने में बिलकुल सक्षम है लेकिन आवाज नहीं उठाते .
आज दलितों में एक युवा नेता उठकर आया है नाम है चंद्रशेखर आज़ाद , ये युवा नेता किसी भी नेता या दलित नेता के खिलाफ बिलकुल नहीं बोलता बल्कि दलित मुस्लिम समाज के लिए लढता है तो क्या दलित बुद्धिजीवी और नेताओं का फर्ज नहीं बनता की ऐसे युवा नेताओं के भी संघठन तैयार करे ताकि देश की युवा शक्ति को एक लोकतांत्रिक नेतृत्व मिल सके