सारनाथ यात्रा और कोरोना का कहर ::अशोक कुमारी
| 25 Mar 2020

बहुत समय से सोच रही थी कि विपश्यना हो आऊ, लेकिन समय ही नही मिल पाता था इस बार बिना रजिस्ट्रेशन किए मित्र के सेन्टर पर जाने का अवसर मिल गया था इसलिए तुरन्त रिजर्वेशन करवा लिया और सीट भी कन्फर्म हो गई 18 से 29 मार्च तक। वैसे भी इन दिनों दिल्ली के हालात जिस तरह के है उसमें लग रहा था कि कहीं दूर जाकर दिमाग को शान्ति प्रदान की जाएं एक तो कोरोना का आतंक दूसरा दिल्ली में हिंसा का माहौल और बहुत से लोगो का घर जल जाना सब कुछ लुट जाना, और चाहकर करके भी उनके लिए कुछ न कर पाना ऐसे माहौल में पागल हो जाने जैसी स्थिति हो गई थी लगा कि पहले खुद को संतुलित किया जाएं। यहीं सोच कर विपश्यना में जाने का सोचा, लेकिन जिस तरह कोरोना का कहर पूरी दुनिया में छाया हुआ ऐसे में क्या मेरा सफर करना उचित रहेगा? इस दुविधा को दूर करने के लिए मैने अपने मित्र से सलाह ली जो कि स्वयं विपश्यना सेन्टर के इन्चार्ज है। वे बोले कि मन के आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए और मन मे उठ रही शंकाओ को दूर करने के लिए ही तो विश्यना की जाती है आप बिना किसी संदेह के आ जाइए यहां ऐसी कोई परेशानी नही है कोरोना के डरने की जरुरत नही है हम सभी तरह की सावधानियां बरत रहे है।

चलिए जी, वहां जाने की शंका से भी मुक्त हो गए और चल दिये हम स्टेशन की ओर, एक रात के सफर के बाद जैसे ही बनारस पहुंचे थे और अगले स्टेशन सारनाथ उतरने की तैयारी मे थे तभी प्रबन्धक मिेत्र का अचानक सुबह फोन आ जाता है बोलते है कहां पहंुचे है ? मै बोली कि उतरने ही वाली हंू फिर वो बोल ही दिए कि अचानक डी एम साहब का आर्डर आ गया है कि सभी तरह के प्रोग्राम सेन्टर जहां लोगो के साथ होने की संभावना है ऐसे आयोजन कैंसिल किए जाने है और इस आदेश की अवहेलना करने वाले को दण्ड का भागीदार होना पड़ेगा।

बस, फिर क्या था सारा मानसिक संतुलन जाता रहा लेकिन फिर भी संतुलन बनाये रखना समय की जरुरत थी, मै बस इतना ही बोल पाई कि अब क्या करुं? वो बोले कि आ जाइए केन्द्र पर फिर देखते है क्या किया जा सकता है? कम से कम आराम तो कर ही लिजियेगा और सारनाथ घूम लिजियेगा। मैने भी मन तो शान्त किया यही सोचा कि कोई बात नही कोरोना से बचाव जरुरी है आखिर सरकार जनता के भले के लिए ही कर रही है। यहीं सोच कर सेन्टर चली गई जो सारनाथ से लगभग दस किलोमिटर की दूरी पर था, सेन्टर बहुत ही सुन्दर और शान्त था चारो ओर हरियाली इस कदर बिखरी थी मन चिंतित होने पर भी हरा-भरा और खुशनुमा हो गया। वहां पहुंचकर वाकई ऐसा लगा कि सारी थकान दूर हो गई लेकिन मन में एक टीस थी कि काश् विपश्यना हो जाता तो दस दिन तक इस शान्त वातावरण में रहने का सुअवसर प्राप्त हो जाता पर अब क्या किया जा सकता है। मित्र जी बोेले कि ‘‘कोई बात नही अब आए है तो एक दिन रुक कर सारनाथ घूम कर जांए’’ हमंे भी उनका ये आइडिया अच्छा लगा, सोचा विपश्यना तो न सही, लेकिन सारनाथ घूमना ही ठीक रहेगा वैसे भी बौद्ध नगरी सारनाथ कभी नही देखा था और यहां वो स्तूप भी प्रसिद्ध है जहां पर तथागत बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को ज्ञानप्राप्ति के बाद पहला उपदेश दिया था।

अगले दिन शाम की टिकट बुक हो जाने के बाद दो दिन और एक रात यहीं पर बिताना था इसलिए प्लानिंग ये किया की एक दिन तो आराम कर लेते है और दूसरे दिन सारनाथ और गंगा घाट घूमते हुए रात की टेªन लेकर दिल्ली रुखसती करते है। 18 मार्च का दिन तो बीत गया लेकिन शाम को ही मित्र ने कहा कि आपको इस सेन्टर को छोड़ कर सारनाथ जाना होगा, कोई बात नही जी अब आज सारनाथ घूमे या कल क्या फर्क पड़ता है, आज ही चले जाते है। तो जी हम चले गए रात में ही अशोक बौद्ध विहार में, वहां पर विहार के प्रबन्धक से बात हुई तो पता चला कि कोरोना के कारण सारनाथ के सभी दर्शनीय स्थल बन्द है क्योकि विदेशी लोग भी बहुतायत संख्या में आते है इसलिए सरकारी फरमान है कोई भी स्थल खुला नही रहेगा। लो जी यहां भी कोरोना कोई बात नही अब मै भी प्लानिंग में थोड़ा परिवर्तन कर लेते है सारनाथ नही तो कोई बात नही गंगा घाट ही सही, यहां पर दशमेशवर घाट बहुत प्रसिद्ध है और वो भी वहां शाम को होने वाली आरती। अब आप सोचेंगे कि एक नास्तिक की बातो में आस्तिक भावना कैसे पनप गई जो आरती देखने की उत्सुक है और गंगा मैया के पास जाने के लिए व्याकुल। अब क्या बताएं आपको कि जब आप इतना दूर आए है तो कुछ तो ऐसा कार्य हो जिससे लगे कि मेरा यहां आना सार्थक हो जाएं बस इतनी सी बात थी अब दिल को बहलाने के लिए।

खैर, सुबह हुई उठना भी एकदम निराशा भरा था लेकिन निराशा में भी आशा की उम्मीद करना एक आशावादी का लक्ष्य होना चाहिए। यही सोच कर मै सारनाथ घूमने निकल गई और वहां के लोकल लोगो से बात करती हुई वहां की वस्तुस्थिति को समझने का प्रयास करने लगी। विहार से निकल कर सारनाथ की यात्रा पर निकल गईं। स्टेशन के रास्ते जाते हुए ऐसा लग रहा था जैसे कि यह एक ऐसा गांव है जहां हमेशा से सन्नाटा और शान्ति रहती है जबकि स्थिति इसके उलट है यहां के रोड आज जितने सूनसान लग रहे है अन्य दिनों में ये उतने ही चहल-पहल वाले रहते थे। चारों ओर देशी-विदेशी पर्यटकों को शोर-शराबा माहौल को खुशनुमा बनाये रखता था, लेकिन आज जिससे भी बात करों एक ही बात करते है कोरोना की। सभी इससे परेशान दिखे, जो लोग रिक्शा चलाते थे वो बोले कि ‘‘ हम लोग अब सारा दिन खाली बैठे रहते है, और दिन तो हम अच्छा कमा लेते थे। यहां पर थाई मन्दिर के रास्ते पर चाय की तो दूसरी और जूस और गोलगप्पे मूंगफली की ठेली वाले शान्त खड़े हुए इस असमंजस में थे कि सामान को ठेले पर खोल कर रखा जाएं या नही?

बौद्ध मन्दिर के बाहर से ही दर्शन कर मैने सेल्फी लेकर आने की सार्थकता एक बार फिर सिद्ध कर दिया और वापिस विहार में आकर आराम फरमाने लगी। इसी दौरान दोपहर मे भोजन के समय विहार में प्रबन्धक से भी बौद्ध धर्म, जातिवाद व अन्य सामाजिक विषयों पर भी बात की। उन्होने ही मुझे अच्छे से रुट समझाया कि कैसे मै शेयर ऑटो में जांऊ तो पैसा बच जायेगा और अगर मै एक ऑटो हायर करके ले जांऊगी तो ज्यादा पैसा लगेगा। सोचा कि टेªन तो शाम की है तो क्यों न शेयर ऑटो ही किया जांए, लेकिन ये क्या आज सुबह के अखबार में लिखा था कि कोरोना के कारण दश्मेश्वर घाट बन्द है। बस फिर क्या था लगा कि जैसे मेरे प्लान आगे आगे और कोरोना का फरमान उसके पीछे पीछे मेरे प्लान को फेल करने के लिए आया है।

मैने भी हार न मानी थी मै भी चल दी घाट पर ये सोचकर कि कोई बात नही घाट के किसी छोर पर तो बैठने का अवसर प्राप्त होगा। इसलिए मै चल दी सावधानी बरतते हुए जगह जगह साबुन से हाथ धोते हुए। जब घाट पर गई तो देखा कि लोग तो है फिर मेरे जान मे जान आई, इसका मतलब मै यहां गंगा किनारे अपना समय व्यतीत कर सकती हूं, जैसा अक्सर मै सोचा करती थी कि कहीं किसी नदी किनारे समय बिताऊं जहां कोई रोकने टोकने वाला ना हों, लेकिन मै बैठूं कहां जिधर भी देखो दो दिन मर्द नहाते गंगा मै डुबकी लगाते नजर आ रहे थे, ऐसा लगा जैसे मर्द अश्लीलता का खुला बाजार चल रहा है और मर्द लोग भी अपने गुप्तांगो की इस तरह नुमाइश अपनी कुण्ठित मन की तृप्ति कर रहे हो। लेकिन ये मुझ जैसी नस्तिक की सोच है हो सकता है कुछ आस्तिक लोग इस दृश्य को दुसरी तरह देखते हो, जैसे कि ये मर्द लोग अपने को पवित्र कर रहे है गंगा मे स्नान करके।

खैर, मै भी कुछ दूर चल कर एक कोना ढूंढ ही लिया जहां सुकून से बैठ सकंू, एक घंटा बिताने के बाद सोचा कि यहां अब इतनी दूर आंए है तो नाव का भी मजा ले लिया जाएं। यही सोच कर नांव के लिए भी रेट पूछा तो चालीस की जगह एक सौ रुपया बताने लगे, नांव में बैठने का ख्याल कैंसिल कर दिया नाविक को भी लगा कि इससे पैसे नही वसूले जा सकते तो चलो जो रेट है उसी पर ले जाए, वो बोला भी कि मैडम सब कुछ बंद कर दिया कोरोना ने। कुछ कमाई नही हो पा रही है लेकिन ये सब हमारे भले के लिए ही है, मै भी उसकी हां मे हां मिला दीं। नाव मे बैठने का अपना ही आनन्द था लेकिन पानी की ओर देखने का मन न करता जब भी गंगा मइया को देखती तो उसमे हरे रंग के गन्दे पानी से मन घिन से भर जा रहा था, नाव से आधे घंटे तक एक छोर से दूसरे छोर घूम कर साथ मे सीपी और शंख बटोर कर थोड़ा मन शान्त हुआ और एक बार अपने सारनाथ आने की सार्थकता को अंजाम दिया।

आज आस्तिकों वाले डायलॉग बोलने का मन किया कि गंगा मइया ने बुलाया था विपश्यना तो बहाना था, तभी तो गंगा की गन्दगी का अंदाजा लग पाया। लेकिन गंगा के भक्तो और कोराना का क्या कहना जब दोनो का आमना-सामना हुआ, पांच बजते ही मै तो निकल ली स्टेशन के लिए, लेकिन घाट से बाहर निकलते ही देखा कि रोड के दोनो ओर फोर्स लगी हुई है जो शाम की आरती में आने वाले भक्तों को जबरन रोक रहे थे, भक्त भी बेचारे हाथ मे फूल की प्लेट लेकर निःसहाय होकर वापिस लौट रहे थे, उस समय ये भक्त लोग क्या सोच रहे होंगे इसे समझने का प्रयास कर रही थी। शायद वो गंगा मइया से कोरोना के कहर से बचने की मन्नत मांग रहे होंगे जिसकी वजह से आज एक भक्त गंगा के धाम पर आरती तक नही कर पा रहा और गंगा मइया असहाय सबको देख रही होंगी।