बॉलीवुड इंडस्ट्री के कुछ बदनुमा गंदे राज क्या हैं?
| 04 May 2020

जन उदय : फिल्मो की चकाचोंध देख कर हर व्यक्ति चाहता है की वो भी इस रौशनी में नहाए ऐसे ही राजाओं , महाराजाओं की जिन्दगी जिए ऐसे ही किसी से प्यार करे जैसे फिल्मो में दिखाया जाता है लेकिन इस रौशनी के पीछे कितना दर्दनाक काला स्याह अँधेरा होता है इसे सिर्फ वही जान सकता है जो इस रौशनी की चाह में फ़िल्मी दुनिया में फंस जाता है आइये हम आपको बताते है क्या क्या होता है इस रौशनी के पीछे के अँधेरे में

ज़ीनत अमानजी को तो हम सब जानते हैं। कितनी खूबसूरत और बेहतरीन अदाकारा रहीं हैं वो। जैसा कि अक्सर जवान लोग करते हैं,ज़ीनत जी भी प्रेम कर बैठीं। ह्रितिक रोशन के पूर्व ससूर- संजय खान के साथ।

उस वक़्त संजय खान शादीशुदा थे। फिर भी दोनो का प्रेम परवान चढ़ा। कुछ समय सब सब ठीक चला और ज़ीनत अमान के साथ उन्होंने दूसरा विवाह भी किया, पहली बीवी होने के साथ साथ जो एक वर्ष तक टिका।

एक बार किसी फ़िल्म के सीन व डेट को ले कर दोनो में कुछ बहस हो गयी और फिर गुस्सैल संजय ने ज़ीनत अमान को भारी पार्टी में एक पंचसितारा होटल में, भारी संख्या में मौजूद लोगों के सामने बालों से पकड़ कर खींचा व साथ के कमरे में मारते हुए ले गये। वहाँ ज़ीनत जी के बाल खींच कर, लातों तक से मारा और इतना पीटा कि पूरी ज़िंदगी के लिये उनकी आँखो में फर्क आ गया और एक बहुत लम्बा समय उन्हें अस्पताल में बिताना पड़ा।

सबसे शर्मनाक बात ये है कि उस वक़्त संजय जी की पहली पत्नी ज़रीन, जो सूजेन खान की माँ हैं, उन्होंने अपने पति से कहा, “और मारो इस (गाली) को”। सब दीवार के उस और होते हुए इस दिल दहलाने वाले कृत्य को देख कर भी मौन रहे।
शक्ल में तो चोट पहुँची लेकिन और जो दर्द दिमाग़ व दिल को हुआ होगा तो उसे ज़ीनत जी ने कैसे ठीक किया होगा?
ज़ीनत जी अपने समय पर पर्दे पर राज करती थीं, फिर भी संजय खान ने उनके साथ जनवरो जैसा बर्ताव किया। अब सोचिये क्या होता होगा उन लड़कियों का जिन्हें कोई जानता नहीं।

बॉलीवुड में केवल परिवारवाद फ़िल्मे व केरियर बनाने तक सीमित नहीं है। इसकी जड़े बहुत नीचे तक हैं। ये लोग कुछ भी करते हैं और फिर हर बुरे से बुरे कर्म के बाद भी बच निकलते हैं।

इसीलिए मुझे बहुत हंसी आती है जब लोग बॉलीवुड वालों को अपना ‘रोल मॉडल’ मानते हैं। जो लोग ऐसा बुरा कार्य करते हैं, और वो जो इसे चुप चाप होने देते हैं उन्हें कोई हक़ नहीं कि आम जनता को उपदेश दे और ना ही इन्हें हक़ है कि वे ‘नारीवाद’ के झंडे लहराये। असल ज़िंदगी में और पर्दे पर दिखने वाले लोग एक से नहीं होते। अपने हीरो खुद चुने- समझदारी के साथ।