महिला आन्दोलन वाली बाई भी नहीं आई इस आधी आबादी का दर्द देखने : डॉ नीलू
| 21 May 2020

कोरोना और लॉकडाउन के बीच देश की आधी आबादी के बारे में भी कुछ सोचने की जहमत उठाइये।जैसे समाज के हरेक मुद्दे से औरतें कमोबेश गौण हो जाया करती हैं, ठीक उसी तरह कोरोना महामारी से उपजे मज़दूर पलायन और इसमें सरकार की प्रचंड विफलता में औरतें फिर कहीं खो गयी हैं। किसी ने उनके बारे में अलग से नहीं सोचा। महिला अधिकारों के पैरोकार पेट की भूख और पैरों के छालों से निपटने में उलझे हैं, पर सरकारों में शामिल ‘सशक्त’ महिलाएं इस मुद्दे पर अपनी संवेदनहीनता के साथ अपने-अपने घरों में लॉकडाउन का पालन करने के लिए याद रखी जाएंगी। इनके सामयिक हस्तक्षेप से सैनिटरी पैड का वितरण तो हो ही सकता था। हाइवे पर स्थित टॉयलेट तो खोले ही जा सकते थे। दुर्भाग्य यह है कि इस देश में महिला अधिकारों का संघर्ष एक खास वर्ग के हितों मात्र पर केंद्रित है। तभी तो छाती पीटने में माहिर हमारी कई महिला राजनेता इस मुद्दे पर सोच भी न पायीं। अंत्याक्षरी से बचे अपने समय में जब ये ट्विटर या टीवी पर बदहाल श्रमिक महिलाओं की तस्वीरें देखती होंगी, तो शायद इन्हें अपना भारत न दिखता होगा। वरना महिला होने के नाते तो इनके हालात समझ ही पातीं।

आप कभी समाज के उच्च वर्ग/जाति से इस मुद्दे पर बात करके देखिये, वे बड़े निश्चित भाव से कह देंगे- “अरे, इन लोगों का शरीर ही अलग होता है, सब सह लेंगी/लेंगे”। आप इस बेशर्मी से बचिए, अपने आसपास ऐसा कहने वालों से बात कीजिए, सम्भव हो तो विनम्रतापूर्वक उन्हें रोकिए-टोकिए। उन्हें बताइए कि इंसान गरीब हो या अमीर, उसके शरीर में समान दर्द और भाव उभरते हैं। साथ ही यह भी ध्यान में रखिए कि हर दिन मज़दूरों की त्रासदी से जुड़ी हज़ारों तस्वीरें देख लेने के बाद भी आप उनका हाल समझ नहीं पाएंगे क्योंकि सूखे चेहरों, बिवाइयों और भीगी आंखों से बयान होती बदहाली कैमरे में न क़ैद वाले हालात के मुकाबले बहुत कम हैं। इन्हीं में से एक सड़कों पर चल रही लड़कियों और औरतों की है।

जरूरत है कि समाज में उनकी स्थिति पर बात हो, समझदारी बने और उनके लिए समर्पित विभागों से उनकी जिम्मेदारी सुनिश्चित करायी जाय। यह तभी सम्भव है जब सचेत समाज वर्ग जो इन अधिकारों के प्रति जागरूक है और नागरिक समाज को निर्धारित करने का दावा करता है, आगे आये। जरूरत है कि हम ‘पैडमैन’ जैसी फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर ताली बजाने को ही अपनी आखिरी जिम्मेदारी न समझ बैठें।