अब पाइल्स में नहीं डराएगी सर्जरी
| 19 Mar 2016

45 साल के तरूण गौड़ को पाइल्स की समस्या थी। उन्होंने लंबे समय तक इलाज कराया लेकिन कुछ खास फायदा नहीं हुआ। सर्जरी को लेकर वह डरे हुए थे, इस वजह से सर्जन के पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहे थे। लेकिन उन्हें स्टेपलर तकनीकी के बारे में पता चला, जिसमें बिना सर्जरी पाइल्स को जड़ से खत्म किया जा सकता है। आखिरकार उन्होंने इलाज के इस नई तकनीकी का सहारा लिया और अब वह पूरी तरह से स्वस्थ हैं।
अपोलो-स्पेक्ट्रा अस्पताल के बैरियाट्रिक सर्जन डॉ़ आशीष भनोट का कहना है कि पाइल्स के इलाज में स्टेपलर तकनीकी बेहद कारगर और एडवांस तकनीक है। इसमें न तो चीरे की जरूरत है और न ही सर्जरी की। सबसे अचछी बात है कि यह इन्फेक्शन फ्री तरीका है, यानी संक्रमण का खतरा जीरो होता है। इसके जरिए पाइल्स को जड़ से खत्म कर दिया जाता है। इलाज के कुछ घंटों बाद मरीज आराम से घूम टहल सकता हे। अस्पताल से भी उसे जल्द छुट्टी मिल जाती है।
बवासीर या पाइल्स को मेडिकल भाषा में हेमरॉइड्स के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें गुदा (एनस) के अंदरूनी और बाहरी क्षेत्र और मलाशय (रेक्टम) के निचले हिस्से की शिराओं में सूजन आ जाती है। इसकी वजह से एनस के अंदर और बाहर या किसी एक जगह मस्से जैसी स्थिति बन जाती है, जो कभी अंदर रहते हैं और कभी बाहर भी आ जाते हैं। करीब 70 फीसदी लोगों को अपने जीवन में किसी न किसी वक्त पाइल्स की समस्या रही है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ पाइल्स की समस्या बढ़ सकती है। अगर परिवार में किसी को यह समस्या रही है तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है। आनुवांशिक समस्या है। आमतौर पर गुदा से संबधित सभी रोगों को बवासीर या पाइल्स ही समझ लिया जाता है, लेकिन इसमें कई और रोग भी हो सकते हैं। हो सकता है, जिन्हें आप पाइल्स समझ रहे हैं, वे फिशर हों। कई बार एनल कैनाल के आसपास के क्षेत्र में एक क्रैक जैसी स्थिति बन जाती है, जिसे फिशर कहते हैं। यह क्रैक छोटे भी हो सकते हैं और इतने बड़े भी कि इनसे खून आने लगे। आमतौर पर पाइल्स बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होते और तीन-चार दिन में अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। कई बार तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि उन्हें पाइल्स हैं। वैसे पाइल्स के यह लक्षण हो सकते हैं |
एनस के इर्द-गिर्द एक कठोर गांठ जैसी महसूस हो सकती है। इसमें ब्लड हो सकता है, जिसकी वजह से इनमें काफी दर्द होता है। -टॉयलेट के बाद भी ऐसा महसूस होना कि पेट साफ नहीं हुआ है। - मल त्याग के वक्त लाल चमकदार रक्त का आना। - मल त्याग के वक्त म्यूकस का आना और दर्द का अहसास होना। - एनस के आसपास खुजली होना और उस क्षेत्र का लाल और सूजन आ जाना।
स्टेज 1: शुरुआती स्थिति में एनस के भीतर छोटी-सी सूजन जैसी होती है। आमतौर पर यह दिखाई भी नहीं देती। इनमें दर्द नहीं होता। बस मरीज मल त्याग के वक्त या जोर लगाने पर खून आने की शिकायत करता है।
स्टेज 2: पहली स्थिति से ज्यादा सूजन होती है। मल त्याग के वक्त जोर लगाने पर खून के साथ मस्से बाहर आ जाते हैं, लेकिन हाथ से अंदर करने पर वापस चले जाते हैं।
स्टेज 3: तीसरी तरह की स्थिति गंभीर होती है। इसमें सूजन वाला हिस्सा या मस्सा बाहर की ओर लटका रहता है और उसे उंगली की मदद से भी अंदर नहीं किया जा सकता। यह बड़े होते हैं और हमेशा बाहर की ओर निकले रहते हैं। अंदरूनी पाइल्स को ही खूनी बवासीर कहा जाता है। सेकंड या थर्ड स्टेज पाइल्स में कोई भी तेल लगाकर शौच के बाद मस्सों को अंदर कर दें। बाहर रहने से इंफेक्शन का डर रहता है।
इसे मेडिकल भाषा में पेरिएनल हेमाटोमा कहा जाता है। यह छोटी-छोटी गांठें या सूजन जैसे होते हैं, जो एनस की बाहरी परत पर स्थित होते हैं। इनमें बहुत ज्यादा खुजली होती है। अगर इनमें रक्त भी जमा हो जाए तो दर्द होता है और तुरंत इलाज की जरूरत होती है।लगातार रहने वाली और पुरानी कब्ज और मल त्याग में ज्यादा जोर लगाना। गुदा मैथुन लगातार और बार-बार होने वाला डायरिया ज्यादा वजन लगातार उठाना मोटापा प्रेग्नेंसी में भी कई बार पाइल्स की समस्या हो जाती है | कब्ज पाइल्स की सबसे प्रमुख वजह है। इससे बचने के लिए भरपूर हरी और रेशेदार सब्जियां खाएं, ताजे फल खाएं और खूब पानी पिएं। इससे मल सॉफ्ट होगा जिससे जोर नहीं लगाना पड़गा। सॉफ्ट और नमी वाले टॉयलेट पेपर का प्रयोग करें और पोंछने की बजाय पेपर से थपथपाएं। ढीले अंडरवेयर पहनें। टाइट अंडरवेयर की वजह से पाइल्स पर रगड़ आ सकती है, जिससे दिक्कत होगी। पाइल्स के मरीज को मल त्याग के बाद भी ऐसा लगता रहता है जैसे अभी और मल आना बाकी है। इसके लिए वे जोर लगाते हैं, जो नुकसानदायक हो सकता है। मल और आने की सेंसेशन उन्हें पाइल्स की वजह से ही होती है, जबकि असल में पेट साफ हो चुका होता है। जोर लगाने से बचें। कोशिश करें, टॉयलेट में एक से डेढ़ मिनट के भीतर फारिग होकर आ जाएं। टॉयलेट में बैठकर पेपर या कोई किताब न पढ़ें।