राम और राबण दो संस्कृतियों के प्रतीक : हर्षवर्धन
| 28 Oct 2016

राम और राबण दो संस्कृतियों के प्रतीक थे ।राम जहाँ आर्य संस्कृति के प्रतीक थे बही राबण अनार्य संस्कृति के प्रतीक थे ।बाल्मीकि रामायण मे लिखा है जो सुरा का सेवन नही करते थे वे असुर कहलाये जो सुरा का सेवन करते थे बे सुर कहलाये ।आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की भाषा विज्ञान की किताब एम ए हिन्दी में पढायी जाती है उसमें असुर शव्द का अर्थ देवताबाची दिया है ।असुर शव्द संस्कृत के अस् धातु से बना है जिसका अर्थ है दिव्य गुण ।देवता शव्द भी दिव् धातु से वना है ।प्राचीन भारत में गोमेध यज्ञ अश्वमेघ यज्ञ नरमेध यज्ञ और अजामेध यज्ञ का प्रचलन था जहाँ हजारों की संख्या में आर्य ऋषिओ द्वारा गाय वैल घोड़े बकरो की बलि दी जाती थी ।स्वामी बिबेकानन्द ने अपने साहित्य में इसे स्वीकार किया है ।स्वामीबिवेकानन्द द्वारा उद्धृत यह श्लोक देखें

अश्वमेधम् गवालम्भम् सन्यासम् पलपैतृकम् ।
देवरेण सुतोपत्ति एतत् पंच कलौ विवर्जयेत् ।

घोडे की बलि गायों की वलि सन्यास पितर पक्ष में गोमांस भक्षण देवर से संतान उत्पत्तियह पांच चीजें कलयुग के लिए बर्जित है ।

सम्भवतः यह पाचो वर्जनाए बौद्ध धर्म के प्रभाव से हुई । राबण उसी अनार्य संस्कृति का पोषक था ।लवकुश द्वारा रखे प्रश्नो का जवाब राम नही दे पाये ।छूआछूत ऊचनीच की भावना से राष्ट्र रसातल में चला गया जातिगत श्रेष्ठता से आज भी समाज में व्याप्त है । आप मिल सके तो राहुल सांस्कृत्यायन की पुस्तक वोल्गा से गंगा पढने का कष्ट करें ।हमें मौलिक ढंग से सोचना चाहिए ।हम किसी के वैचारिक गुलाम नही हैं ।