पैसे से अधिक रिश्तों को दें महत्व : ऋतु सोढ़ी
| 14 Nov 2016

आजकल की आपाधापी भरी दुनिया में अगर किसी चीज़ का महत्व है तो वो है पैसा। ऐसा नहीं है कि पहले लोभ या लालच नहीं थे। जबसे सृष्टि का सृजन हुआ है तब ही से सत्ता व पैसों के लालच ने धीरे धीरे इंसानों पर राज किया है। होना तो यह चाहिये था कि इंसान हर चीज़ का इस्तेमाल तरीके से करता परंतु आज पैसे ने हर रिश्ते को लील लिया है। आपकी पूछ तब तक है जब तक आपके पास पैसा है। रिश्तों की पवित्रता और भाई बहनों के त्याग अब सिर्फ सुनी सुनाई बातें हैं। यदि गलती से कोई ईमानदार इंसान आपको मिल भी जाये तो आप उस पर यकीन नहीं कर पाते।
इस पैसे ने पता नहीं कितने रिश्ते दूर कर दिये। कुछ ही दिन पहले मुझे बहुत पुरानी सहेली मिली। उसका चेहरा उतरा हुआ था।
बातों ही बातों में उसने मुझे बताया कि उसके सगे भाई ने उस पर कोर्ट केस कर दिया है। सिर्फ इसलिए कि उसे पिता की संपत्ति में हिस्सा ना मिल सके। पैसों ने संबंधों में दरार डाल दी।
क्या पैसा साथ साथ मनायी खुशियों से ज़्यादा ऊपर है? आप पैसे से हर सुख खरीद सकते हैं पर क्या बचपन की यादें भी खरीद सकते हैं? भाई बहन खराब संबंधों के बीच उन सुहानी यादों को अगर एक बार भी याद कर लेते तो क्या तब भी नाराज़गी रहती? यूरोप की यात्रा से बड़ी खुशी क्या साथ मिलकर मनायी दीपावली में नहीं थी? मां की गोद, पापा की डांट, दादी नानी के घरों की मीठी यादों की जगह पिज़्ज़ा और मेक्डोनल्डस ने कब ले ली पता ही नहीं चला। बच्चे आज स्कूल की तरफ से मैनर्स सीखने लाखों खर्च करके अमेरिका जाते हैं पर क्या नानी के घर जाकर पहले के बच्चे कुछ नहीं सीखते थे?
हमने अपने बच्चों को बहुत सारी सुविधाएं दे दीं पर रिश्तों का महत्व बतलाना भूल गए।
स्कूल कॉलेजों में अमीर बच्चों की देखादेखी मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे भी मंहगे कपड़ों, मोबाइल फोन्स और अन्य व्यर्थ की चीज़ों के लिए अपने माता पिता पर दबाव डालते हैं। यह सब कुछ हम स्वयं अपने बच्चों को सिखा रहे हैं और नाम पश्चिमी सभ्यता का लगा देते हैं। अत्याचार, पाप और अनुचित कार्य हमसे देखकर बच्चे सीखते हैं। जवानी में तो किसी को परवाह नहीं होती परंतु बुढ़ापे में यही मां बाप अक्सर रिश्तों की दुहाई देते नज़र आते हैं। आप जो बीज बोयेंगे वृक्ष तो वही निकलेगा।
आवश्यक है कि समय रहते रिश्तों को संभाल लिया जाये। पैसे उतने ही होने चाहिए जिसमें हमारा परिवार सुकून से रह ले और किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़े। आवश्यकता से अधिक धन सिर्फ अशांति लाता है। पैसों से अधिक रिश्तों को संजोएं। ये ना हो कि जब उनकी आवश्यकता हो तब हमें देखने , संभालने वाला ही कोई ना बचे। बहुत से लोग मानते हैं कि उन्हें कभी किसी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी तभी वे बात बात पर झगड़े पर उतारू हो जाते हैं पर मेरा अनुभव यही कहता है कि ज़िंदगी में कभी चींटी की भी आवश्यकता पड़ सकती है। कभी भी बेवजह लड़ झगड़ कर दुश्मनी नहीं बढ़ानी चाहिए। वक्त ज़रूर बदला है परंतु आज भी चीज़ें बेहतर की जा सकती हैं। रिश्तों को महत्व देकर अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनायें।
अच्छे कार्य करें ताकि आपके जाने के बाद समाज का हर वर्ग आपको याद करे। आखिर मनुष्य देह आपको सिर्फ धन इकट्ठा करने को नहीं मिली। पैसा तो मृत्यु के बाद आप साथ ले जा नहीं सकते परंतु अपने अच्छे कर्म अवश्य ले जा सकते हैं। सोचिये और बदलिये अपने जीने की वजह आज और अभी से।