मंज़िलें और भी हैं : ऋतु
| 29 Nov 2016

आधुनिक युग मशीनों और तकनीक का युग है। हर तरफ मशीनों का शोर है। किसी को भी दूसरे व्यक्तियों के लिए समय नहीं है। नारी ने भी बहुत तरक्की की है और आज लगभग हर क्षेत्र में नारी शक्ति बनकर उभरी है।
पिछले कुछ समय से मैं यह देख रही हूं कि हमारे समाज में आधुनिक या पिछड़ा होना समझदारी से नहीं बल्कि कपड़ों से तय किया जाता है। यदि आपने ब्रांडेड कपड़े पहने हैं तो आप आधुनिक हैं और यदि आपने सस्ते कपड़े पहने हैं तो आप पिछड़े वर्ग से संबंधित होंगे। यदि कोई स्त्री स्कर्ट पहनती है तो अवश्य ही वह दारू भी पीती होगी या अगर वो किसी पुरुष मित्र के साथ घूमने जाये तो अवश्य ही उसके संबंध गलत ही होंगे।
क्या आपको भी ऐसा ही सोचने की आदत है? यदि आप सिर्फ अपनी सोच के आधार पर चरित्र निर्माण करते हैं तो यकीनन आप कितने भी सुंदर कपड़े पहनते हों आप आधुनिक नहीं हैं। कहीं ना कहीं आपको बदलने की ज़रूरत है। हम बहुत ही आसानी से दूसरों पर कमेंट करते हैं बिना यह सोचे कि दूसरों पर इसका विपरीत असर भी पड़ सकता है।
चरित्र का अच्छा बुरा होना आपकी सोच से बनता है नाकि आपके कपड़ों से। आज जब हम सभी घर बाहर काम कर रहे हैं तो यह लगभग नामुमकिन है कि हम सिर्फ महिलाओं से ही बात करें या साड़ी पहनकर ही काम पर जायें। दिन भर की भाग दौड़ व कई तरह के काम के बीच एक महिला को पूरा हक है कि वह अपने कपड़े आवश्यकतानुसार पहने नाकि आपकी सोच के अनुसार।
यदि वो जीन्स में सुविधा महसूस करती है तो उसे पहनने का पूरा हक है। बस व ट्रेन में वैसे भी साड़ी में असुविधा हो सकती है। पुरुष मित्र रखना आपत्तिजनक नहीं है। मित्र मित्र ही होता है फिर चाहे वह पुरुष हो या महिला। बहुत सी स्त्रियां कामकाजी महिलाओं पर अनावश्यक टीका टिप्पणियां करती नज़र आती हैं। उनके उठने बैठने , चलने फिरने तक का पोस्टमॉर्टम किया जाता है।
मेरा मानना है कि हम सबको अपनी सोच बदलनी होगी। मंज़िलें और भी हैं तो क्यों बेकार किसी दूसरे को बिना जाने उस पर सोच सोचकर वक्त बर्बाद किया जाये? सबकी ज़िदंगी अपनी अपनी होती है। हम सबको समाज सुधारक बनने की जगह समाज के नव निर्माण में अपनी ताकत लगानी चाहिए। कितने सारे क्षेत्र हैं जहां नारी को अब भी पहुंच बनानी है। स्त्री कामकाजी हो या घरेलू, सबके अपने कार्य हैं। घरेलू स्त्रियां सौभाग्यशाली होती हैं जिन्हें बाहर जाकर कमाने की खातिर लोगों की बातें नहीं सुननी पड़ती हैं। घरेलू स्त्रियां अपने शौक घर बैठे ही पूरे कर सकती हैं। अपनी आमदनी बढ़ा सकती हैं। हर वक्त पैसों की तंगी का रोना रोने की बजाये कुछ काम करके आमदनी बढ़ा सकती हैं। व्यर्थ के कामों में समय गंवाने से बेहतर होता है कि आप कुछ नया सीखें।
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। एक कम पढ़ी लिखी महिला ब्यूटी कोर्स कर स्वंय को बदल सकती है। हर महिला में कोई ना कोई गुण तो होता ही है। पतियों पर आंख रखकर उनकी प्रशंसा मिलेगी ऐसा सोचना एक बेवकूफी है। स्वंय को इतना काबिल बनायें कि पति आपसे पूछे बिना कुछ कर ही ना पायें। एक दूसरे के सहयोगी बनें ताकि सब आपके रिश्ते की मिसाल दें।फैशनेबल होने का अर्थ बदलें और समाज की सोच बदलें। आप द्वारा किया एक भी कार्य जो लीक से हटकर हो वह समाज की दशा व दिशा दोनों बदल कर रख देगा। मंज़िलें और भी हैं तो फिर क्यों खुद को सीमित करना? नारी होकर एक नयी मिसाल कायम करो।
क्षेत्र चाहे कोई भी हो परंतु स्वंय की सोच बदलकर हम अवश्य एक ऐसा समाज बना सकते हैं जो देश ही नहीं पूरे विश्व में भारत की आधुनिक नारी की पहचान को नये मायने दे। जहां पश्चिम की स्त्रियों ने अपने समाज में एक छवि प्रस्तुत की है जो बोल्ड होने के साथ कुछ भी करने में सक्षम है। हमें भी अपना नया रूप विश्व को दिखाना है जो ना केवल कपड़ों से आधुनिक बन रहा है बल्कि खुली सोच रख आगे बढ़ रहा है।